मौन का मतलब चुप हो जाना नहीं है..
बल्कि समस्त इन्द्रियों को मौन कर देना, शान्त कर लेना है..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
औरंगाबाद नरेंद्र पियुष जैन / परतापुर राजस्थान अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ की अहिंसा संस्कार पदयात्रा दिक्षा भुमी परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान के लिए चल रही है आज़ यह अहिंसा संस्कार पदयात्रा का दिक्षा भुमी परतापुर बांसवाड़ा में भव्य मंगल प्रवेश हुआ है उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि। वाणी मौन के साथ-साथ आँख, कान, नाक, शरीर और रसना इन्द्रिय के अलावा छठी इन्द्रिय मन का मौन रखना सबसे कठिन साधना है।
मौन में तीन बातें। -शब्द मौन में – वाणी मौन है लेकिन इन्द्रिय सक्रिय है।
नयन मौन – वाणी मौन से थोड़ा कठिन है। आँखों से इशारे नहीं कर सकते। फिर अखियों से गोली नहीं मार सकते।
मन मौन – नयन मौन से भी कठिन है मन का मौन, जिसे कहते हैं आर्य मौन। जब इन्द्रिय और मन मौन हो जाता है, तो अन्दर की शक्तियों में स्वतः ही सम्वाद होने लगता है। ऐसी स्थिति में असम्भव कार्य भी सम्भव होने लगते हैं।
एक मौन अनेक लाभ —
वाणी के अपव्यय से बच जाते हैं।
भीतर की शक्ति जाग्रत हो जाती है।
स्मरण शक्ति तेज हो जाती है।
वचनों में प्रमाणिकता आ जाती है।
मौन में स्वयं से बात और स्वयं की आवाज सुनी जा सकती है…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद














