वर्तमान की जिंदगी

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वर्तमान की जिंदगी

फागी संवाददाता
राजाबाबू गोधा

16अप्रैल
अब खुद ही गिर जाओ तुम, टूट कर जमीं पर ।
पत्थर मारने वाला बचपन, मोबाइल मे व्यस्त है।।

अच्छी थी, पगडंडी अपनी।
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।

फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।

नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।

उजड़ गए, सब बाग बगीचे।
दो गमलों में, शान बहुत है।।

मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।
कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।।

पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।
कहते हैं, आराम बहुत है।।

बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।

आदी हैं, ए.सी. के इतने।
कहते बाहर, गर्मी बहुत है।।

झुके-झुके, स्कूली बच्चे।
बस्तों में, सामान बहुत है।।

नही बचे, कोई सम्बन्धी।
अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है।!

सुविधाओं का, ढेर लगा है।
पर इंसान, परेशान बहुत है।।

प्रेषक :मोनिका जैन बडजात्या परिवार घोडीवाले जयपुर

राजाबाबू गोधा जैन महासभा मिडिया प्रवक्ता राजस्थान

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