समस्त दुखों और संसार का मूल कारण मोह और मिथ्यात्व ही है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ……………………
अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट….
वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। इंद्रियों के भोग उपभोग में ही मिथ्या दृष्टि रमण करता है। स्व तत्व आत्म तत्व को नहीं जानता है। इंद्रिय विषय में लीन होकर पाप करता है। जीव स्वयं की आध्यात्मिक स्वरूप अनंत ज्ञान अनंत वीर्य अनंत सुख अनंतबल शुद्ध बुद्ध आनंद को नहीं जानता है। मोही जीव स्व स्वरूप को नहीं जानता है। समस्त दुखों का तथा संसार का मूल कारण मोह व मिथ्यात्व है। इंद्रियों की प्रवृत्ति बाह्य होती है., आंतरिक नही। स्वयं की आंखों को स्वयं नहीं देख सकते उसको देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। जो सत्य है वह मेरा है यह मानना सम्यक दर्शन है। जो मैं कहता हूं वही सत्य है यह मानना मिथ्यात्व है।
भोग भूमि में भाव मिथ्या्व होता है द्रव्य मिथ्यात्व नहीं। भाव रूप में हर जीव मिथ्या दृष्टि है। परम सत्य आत्म तत्व को वास्तविक सत्य को नहीं मानना मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के अनेक भेद, प्रभेद है। विपरीत,एकांत, विनय, संशय, अज्ञान इस प्रकार मिथ्यात्व के पांच भेद हैं। काल से ही सब कुछ होता है ऐसा मानना भी मिथ्यात्व है। एक आयाम को मनाना अन्य आयाम को नकार देना भी मिथ्यात्व है। निश्चय को ही मानना व्यवहार को नहीं मानना यह भी मिथ्यात्व है। व्यवहार को ही मानना निश्चय को नहीं मानना यह भी मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व सबसे बड़ा पाप है।
जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक कर्म बंध होता रहता है। कर्मबंध का मुख्य कारण मोह तथा मिथ्यात्व है। निगोदिया जीव होने का मुख्य कारण मिथ्यात्व है। निगोदिया जीव महापापी है। क्योंकि वह अनंतानुबंधी कषायों से युक्त भाव कलंक से कलंकित होते हैं।
दर्शन मोह, चरित्र मोह के तीव्र कर्मबंध के कारण स्वयं को जीव नहीं जान पाता है। मिथ्यात्व गुणस्थान में 100 पाप प्रकृतियों का बंध होता है मिथ्यात्व से ही संसार भ्रमण होता है। सम्यक दर्शन से मिथ्यात्व रूपी घना वृक्ष कट जाता है।
ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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