रिश्तों की महक दूरियों से कम नहीं होती। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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रिश्तों की महक दूरियों से कम नहीं होती। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
औरंगाबाद/परतापुर नरेंद्र पियुष  बांसवाड़ा राजस्थान।अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज ससंघ परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान में विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्योंकम संपन्न हो रहें हैं उसी श्रुंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि  जीवन में यदि साथ और अपनापन हो, तो रिश्तों की दुनिया जन्नत बन जाती है..
अन्यथ: कागज़ी फूलों से गुलाब की खुशबू कहाँ आती है❓
इसलिए रिश्तों के नाज़ुक पौधे को प्रेम, सम्मान और परवाह के जल से सींचिए, और अपने जीवन में अपनत्व के बसंत को आमंत्रित कीजिए। आजकल रिश्तों में कभी प्रेम का बसंत होता है, तो कभी वाद-विवाद के झंझावात से पतझड़ जैसा माहौल बन जाता है। सच्चे और सफल वही रिश्ते हैं, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मजबूती से एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं।
वर्तमान समय में रिश्तों की डोर रेशम के धागे से भी अधिक नाज़ुक हो गई है। वर्षों पुराने संबंध भी, चंद शब्दों से बिखर जाते हैं। रिश्तों को सँभालने का एक ही मूल मंत्र है — प्रेम, सम्मान और परवाह। अन्यथ: छोटी-छोटी बातें भी बड़ा रूप ले लेती हैं।
आज स्थिति यह है कि लोग प्रेम से बात करने के बजाय जल्द ही ऊँची आवाज़ और आक्रोश पर उतर आते हैं। एक-दूसरे की गलतियाँ निकालना, खामियाँ गिनाना, शिकायतें करना, पुरानी बातों को बार-बार याद दिलाकर अपने पक्ष को सही ठहराने की कोशिश करना, ये सब रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है।
ऐसे माहौल में रिश्तों का क्या हाल होगा—यह आप स्वयं समझ सकते हैं…!!!            नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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