​नाम, पहचान और निर्वाण: क्या वीतरागी मार्ग को अलंकरणों की अपेक्षा है?

0
1

​नाम, पहचान और निर्वाण: क्या वीतरागी मार्ग को अलंकरणों की अपेक्षा है?
जैन धर्म की श्रमण परंपरा संसार की अनूठी परंपरा है, जहाँ ‘दीक्षा’ केवल वस्त्र परिवर्तन नहीं, बल्कि एक नए जन्म का उद्घोष है। जब एक साधक गुरु के चरणों में पंचमुष्टि लोच करता है, तो वह केवल केशों का नहीं, बल्कि अपने पूर्व नाम, कुल, जाति और लौकिक प्रतिष्ठा का भी विसर्जन कर देता है। आगमों की भाषा में वह ‘अनगार’ (जिसका कोई घर न हो) और ‘अकिंचन’ (जिसके पास अणु मात्र भी परिग्रह न हो) बन जाता है। किंतु वर्तमान काल में श्रमणों के नाम के साथ जुड़ती ‘डॉक्टरेट’, ‘राष्ट्र गौरव’ या ‘वाचस्पति’ जैसी उपाधियाँ यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या हम वीतराग मार्ग में पुनः लौकिक विशेषणों का परिग्रह तो नहीं कर रहे?
​आगम का आलोक: देह से पृथक, पदवी से परे
​भगवती सूत्र और उत्तराध्ययन सूत्र जैसे महान आगमों में साधु के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है, वह पूर्णतः अंतर्मुखी है। उत्तराध्ययन सूत्र के ‘जीयपय’ (विजय पद) नामक अध्ययन में स्पष्ट है कि तप का फल आत्म-विशुद्धि है। जब एक मुनि ने स्वयं को इस नश्वर देह से पृथक अनुभव कर लिया है, तब उस देह के नाम के साथ विश्वविद्यालय की डिग्रियों या संस्थागत अलंकरणों को जोड़ना आध्यात्मिक विरोधाभास जान पड़ता है।
​जैन दर्शन के अनुसार, परिग्रह केवल धन-धान्य का नहीं होता; ‘मूर्च्छा’ (ममत्व भाव) ही परिग्रह है। यदि एक साधु को अपनी विद्वत्ता की लौकिक स्वीकारोक्ति (पदवी) में आनंद आने लगे, तो यह ‘मान’ कषाय की सूक्ष्म पुष्टि है। आगम सम्मत मार्ग तो वह है जहाँ मुनि लोक-प्रशंसा से वैसे ही भयभीत रहे जैसे कोई विषैले सर्प से।
​सम्यक् ज्ञान बनाम शैक्षणिक उपाधियाँ
​निश्चय ही जैन मुनि ज्ञान के अगाध सागर होते हैं, किंतु आगमों में ज्ञान का फल ‘विरक्ति’ बताया गया है, ‘विभक्ति’ (डिग्रियाँ) नहीं।
​“नाणं पगासयइ, तवो विसोहइ” अर्थात ज्ञान प्रकाश करता है और तप विशुद्धि।
​किसी विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त ‘डॉक्टरेट’ उस ज्ञान की प्रामाणिकता नहीं हो सकती जो आत्म-साक्षात्कार से उपजा हो। जब एक वीतरागी संत के लिए स्वर्ण और पाषाण एक समान हैं, तो फिर उनके लिए कागजी प्रशस्ति पत्र या धातु के मेडल का क्या मूल्य? यह विडंबना ही है कि जो संसार को ‘असार’ बता रहे हैं, वे ही संसार द्वारा दी गई मानद उपाधियों से अलंकृत हो रहे हैं।
​अपरिग्रह महाव्रत पर सूक्ष्म आघात
​श्रमण के पांच महाव्रतों में ‘अपरिग्रह’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पदवियाँ एक प्रकार का ‘मानसिक परिग्रह’ हैं। यह साधक के चित्त में एक विशिष्टता का बोध पैदा करती हैं, जो उसे अन्य श्रमणों से ‘बड़ा’ या ‘विशेष’ सिद्ध करने की चेष्टा करती हैं। जैन आगमों के अनुसार, मुनि संघ में ज्येष्ठता और श्रेष्ठता का आधार ‘दीक्षा पर्याय’ (संयम की आयु) और ‘चारित्र’ है, न कि कोई सांसारिक उपलब्धि। ‘विद्या’ यदि विनय न लाए और संसार से न छुड़ाए, तो वह केवल ‘अक्षर-ज्ञान’ है, ‘आगम-ज्ञान’ नहीं।
​श्रावकों का कर्तव्य: कृतज्ञता या भटकाव?
​अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भक्त श्रावक अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उन्हें ऐसी उपाधियाँ समर्पित करते हैं। किंतु यहाँ विचारणीय है कि क्या गुरु के उपकार का बदला उन्हें पुनः संसार की जंजीरों (नाम और प्रतिष्ठा) से बाँधकर दिया जा सकता है?
​श्रावक का सच्चा धर्म गुरु के ‘संयम’ की सुरक्षा करना है।
​अनुसरण, अर्पण नहीं: गुरु की सच्ची गुरु-दक्षिणा उनके द्वारा दिखाए गए मोक्ष-मार्ग पर कदम बढ़ाना है।
​चारित्र की वैयावृत्ति: श्रावकों का कर्तव्य है कि वे साधु को ऐसे प्रसंगों से बचाएं जो उनके वैराग्य में बाधक हों।
​आत्म-शुद्धि: एक वीतरागी संत के लिए भक्त की आत्म-विशुद्धि और व्रतों के प्रति दृढ़ता ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।
​निष्कर्ष
​जैन धर्म ‘अक्षरों’ का नहीं, ‘आचरण’ का धर्म है। जिस दिन एक श्रमण के नाम के आगे से ‘डॉक्टर’ हटकर केवल ‘मुनि’ या ‘अनगार’ रह जाएगा, उस दिन उनकी आध्यात्मिक आभा और अधिक प्रखर होगी। पदवियाँ समाज को प्रभावित कर सकती हैं, किंतु मोक्ष मार्ग को नहीं। हमें यह स्मरण रखना होगा कि निर्वाण की प्राप्ति ‘विशेषणों’ के साथ नहीं, बल्कि ‘विशुद्धि’ के साथ होती है। आगम का स्पष्ट संदेश है—साधु वह है जो ‘अनाम’ होने की साधना करे, न कि ‘नाम’ को विशेषणों से सजाने की।
लेखक
मयंक जैन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here