दिखावे की दुनिया में खोता हुआ असली ‘मैं’” -अंशुल शास्त्री

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मुरैना/सांगानेर (मनोज जैन नायक) आज का मनुष्य सफलता को एक ही तराजू में तौलता है – धन । उसके लिए उपलब्धि का अर्थ है अधिक से अधिक पैसा कमाना, ऊँचा पद पाना और समाज में अपनी एक चमकदार छवि बनाना। वह मान बैठा है कि यदि उसके पास अपार धन है और लोग उसके बारे में अच्छा सोचते हैं, तो वही उसकी असली पहचान है। परंतु इस दौड़ में वह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न को भूल जाता है—“मैं वास्तव में कौन हूँ ?”
‎ ‎वर्तमान समय में दिखावे का आकर्षण इतना प्रबल हो गया है कि व्यक्ति अपने वास्तविक भावों को दबाकर एक कृत्रिम व्यक्तित्व गढ़ने में लगा रहता है। चाहे भीतर कितना ही दुःख, तनाव या खालीपन क्यों न हो, बाहर वह स्वयं को प्रसन्न और सफल दिखाने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मुखौटा है, जिसे पहनकर वह समाज के सामने खड़ा होता है, लेकिन इस मुखौटे के पीछे उसका असली ‘स्व’ कहीं खो जाता है।
‎। ‎मनुष्य यह जानता है कि उसके भीतर एक गहरा असंतोष है, फिर भी वह उसे अनदेखा करता है। वह यह स्वीकार करने से डरता है कि उसकी सारी भौतिक उपलब्धियाँ भी उसे सच्चा सुख नहीं दे पा रहीं। यही कारण है कि वह बाहरी प्रशंसा और मान्यता के पीछे भागता रहता है, क्योंकि उसे लगता है कि शायद वहीं उसे संतोष मिलेगा। परंतु यह संतोष क्षणिक होता है, और फिर वही खालीपन लौट आता है।
‎ ‎असल में, धन और प्रतिष्ठा जीवन के साधन हो सकते हैं, लेकिन वे जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकते। सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान में निहित है। जब तक मनुष्य अपने भीतर झाँककर यह नहीं समझेगा कि उसकी असली पहचान क्या है, तब तक वह भटकता ही रहेगा।
‎ ‎आवश्यकता इस बात की है कि हम थोड़ी देर रुकें, अपने भीतर उतरें और स्वयं से प्रश्न करें—क्या हम जो बन गए हैं, वही बनना चाहते थे? क्या हमारी खुशियाँ सच में हमारी हैं, या केवल दूसरों को दिखाने के लिए हैं? जब हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजने लगेंगे, तभी हमें अपने अस्तित्व का वास्तविक अर्थ समझ में आएगा।
‎अंततः, जीवन का उद्देश्य केवल धन अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने ‘स्व’ को पहचानना है। क्योंकि जब हम स्वयं को जान लेते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में सुख और शांति का अनुभव कर पाते हैं।
भाव लेखक
अंशुल जैन शास्त्री

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