पंथवाद-संतवाद का राग भी आग है:उपाध्याय विशेषसागर
विनोद रोकडे जैन मालेगांव
अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थकर आदिनाथ भगवान ने अपने उपदेश में २ प्रकार के धर्म का उपदेश किया था , “ऋषी बनो या कृषी करो ‘अर्थात श्रवण बनो या श्रावक बनो उत्तम मार्ग है मुनि बनना यदि मुनि नहीं बन सकते तो कम से कम मुनि भक्त बनो उक्त उद्गार प.पू. विराग कीर्ति उपाध्याय श्री 108 विशेषसागर जी महाराज ने भैंसदेही में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा।
पू उपाध्यायश्री ने आगे कहा धर्म एक है, पर धर्म की परिभाषा भिन्न-भिन्न हो सकती है, इस पंचमकाल में सबसे बड़ा धर्म क्या है ? इसका उत्तर है पंथवाद- संतवाद से बाहर निकल कर पिंछी-कमंडल धारी संतों की सेवा करना पं. दोलत राम जी ने ठीक ही कहा है “यह राग आग दहे सदा तार्ते समामृत सेइये, पंथ का राग, संत का राग भी आग है जब तक पंथवाद -संतवाद में लगे रहोगे तो वितरागता की प्राप्ति नहीं हो सकती। अब समय आ गया है समझने की संभलने की,
पू उपाध्याय श्री ने आगे कहा आज प्रत्येक समाज, नगर व परिवार में ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात करें, कैंची का कार्य नहीं सुई का कार्य करें। समाज व परिवार को छुटने में समय नहीं लगता पर जोड़ने के लिए सारा जीवन भी कम पड़ जाता / उपाध्याय संघ का मंगल विहार विरागोदय पथरिया की और चह रहा है।
धीरज जैन जामनेर (महाराष्ट्र)
मो:7083481448












