मन पर विजय पाने वाला विश्व विजयी बन जाता है:ज्ञान विज्ञान दिवाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव …………………
अजीत कोठिया डडूका बांसवाड़ा राजस्थान की रिपोर्ट
. वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए। शक्ति सुप्त है जागृत करना चाहिए। मन पर विजय प्राप्त करने वाला विश्व विजई बन जाता है।
जो पुरुष चित्त की शुद्धता को न करके भली प्रकार मुक्त होना चाहता है वह मृग तृष्णा की नदी में जल पिता है। अहंकार मुक्ति, परिग्रह मुक्ति कषाय मुक्ति बिना मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती हैं। मृग मरीचिका से अधिक राग द्वेष क्रोध मान, माया लोभ, मोह,आसक्ति बढेगा।
मृग मरीचिका अर्थात रेगिस्तान में मृग पानी की प्यास बुझाने के लिए आकुलित होते हैं इधर-उधर चारों ओर पानी की तलाश करते हैं उन्हें दूर से रेत भी रिफ्लेक्शन के कारण पानी की तरह दिखाई देती है। अतः वह उसे पानी समझकर के भागते हैं भागते भागते थक जाते हैं वहां जाकर देखते हैं तो रेत होती है पानी नहीं होता है। भागने से और प्यास लगती है और प्यास के कारण मर भी जाते हैं। मृग तृष्णा की तरह धर्म भी अधर्म, सुख भी दुख रूप होते हैं। मृग की तरह धर्म करने वाला भी समझता है मैं धर्म कर रहा हूं परंतु वह धर्म नहीं अधर्म होता है।
आचार्य श्री कहते हैं,हे मुनि यह चित्त रूपी हाथी बहुत पराक्रमी है वह स्वच्छंद रहेगा तो संयम पालन नहीं करने देगा। चित्त रूपी दैत्य ने इस जीव के पराक्रम को हरण किया है।चित्त रूपी राक्षस विषय कषायो को ग्रहण करता है। यहां पर चित्त को राक्षस की उपमा दी है क्योंकि वह अधिकांश समय बुरे विचार बुरे कार्य ही करता रहता है। आत्मा को जाने बिना मन शुद्ध नहीं कर सकते भाव शुद्ध नहीं कर सकते मन स्थिर नहीं कर सकते हैं ध्यान नहीं कर सकते। जब तक भाव शुद्ध नहीं तब तक समता नहीं आती है।
शरीर को मैं मानना मिथ्यात्व है। शरीर को सजाना शव को सजाना है।
धर्म से ही परम सुख परम आनंद प्राप्त होता है परंतु अधिकांश लोग धर्म के नाम पर अधर्म ही करते हैं।
शरीर मलमूत्र का पिंड मृग मरीचिका है इस जीव में अनंत बार अनंत भवों में अपने पति अपने पुत्र पुत्री नाती पोते आदि परिवार जनों को तथा अनंत जीवो को अनंत बार खाया है। मन शुद्धि, भाव शुद्धि आत्म शुद्धि बिना इस जीव ने अनंत जीवो को मारा है खाया है कष्ट दिया है। अपवित्र भाव से करोड़ों बार साधु बने परंतु मोक्ष प्राप्त नहीं कर सके। इस जीव ने विश्व के हर जीव को मारा है खाया है कष्ट दिया है। पवित्र भाव बिना धार्मिक क्रियाएं व्यर्थ है अनर्थ है।
कोई भी कार्य दूसरों को कष्ट देकर दबाव डालकर शोषण करके करना धर्म नहीं है।
मुनि श्री श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता मै परम सत्य हूं अतः शाश्वत हू, से मंगलाचरण किया।
ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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