भारतीय संस्कृति में पर्व, त्योहार और व्रत केवल परंपरा का निर्वाह मात्र नहीं हैं, बल्कि वे मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्थान, नैतिक संवर्धन और सांस्कृतिक संरक्षण के आधारस्तंभ हैं। ये उत्सव मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ते हुए आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत पावन और महत्त्वपूर्ण पर्व है—अक्षय तृतीया, जिसे दान, तप और अनंत पुण्य का प्रतीक माना गया है।
अक्षय तृतीया का महत्व :
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व “अक्षय तृतीया” या “आखा तीज” के नाम से प्रसिद्ध है। “अक्षय” शब्द का अर्थ है—जिसका कभी क्षय न हो। शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए शुभ कर्म—जैसे दान, जप, तप, व्रत आदि—अक्षय फल प्रदान करते हैं।
इसकी महिमा इस प्रकार व्यक्त की गई है—
“अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तम्।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः।
तच्चाक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥”
अर्थात् इस तिथि पर किया गया हवन, दान आदि कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए मुनियों ने इसे अक्षय तृतीया कहा है।
जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का ऐतिहासिक आधार:
जैन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्त्व है। इसी दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने दीर्घकालीन कठोर तपस्या के उपरांत प्रथम बार आहार ग्रहण किया था।
दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात भगवान ऋषभदेव ने छः माह तक कठोर तप किया। जब वे आहार के लिए नगर-नगर विचरण करने लगे, तब उस समय समाज को आहारदान की विधि ज्ञात नहीं थी। श्रद्धालुजन उन्हें विविध भौतिक वस्तुएँ अर्पित करते रहे, किन्तु वे उन्हें स्वीकार नहीं करते थे। तत्पश्चात राजा श्रेयांस को पूर्वजन्म का स्मरण हुआ और उन्होंने विधिपूर्वक भगवान को इक्षुरस (गन्ने का रस) अर्पित किया। यह घटना वैशाख शुक्ल तृतीया को घटित हुई और यहीं से संसार में आहारदान की परंपरा का प्रारंभ हुआ।
दान परंपरा का प्रवर्तन : मानवता का प्रथम संस्कार
अक्षय तृतीया का यह प्रसंग केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के नैतिक विकास का प्रारंभिक बिंदु है। जैन दर्शन में दान को केवल वस्तु का परित्याग नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ के त्याग के रूप में देखा गया है।
इस दृष्टि से यह पर्व हमें सिखाता है कि—
दान करुणा का मूर्त रूप है।त्याग ही वास्तविक समृद्धि है। संयम ही जीवन का सच्चा सौंदर्य है।
हस्तिनापुर : दानतीर्थ की पुण्यभूमि :
इस ऐतिहासिक घटना का साक्षी बना हस्तिनापुर, जो आज जैन धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यहीं पर भगवान ऋषभदेव ने प्रथम आहार ग्रहण किया और राजा श्रेयांस ने प्रथम दान देकर दानतीर्थ का प्रवर्तन किया। इस कारण हस्तिनापुर केवल एक नगर नहीं, बल्कि धर्म और दान की जीवंत परंपरा का प्रतीक बन गया है।
व्रत, साधना और आध्यात्मिक अनुशासन :
अक्षय तृतीया के अवसर पर जैन श्रद्धालु विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ— व्रत, उपवास या एकाशन करते हैं।जिनालयों में अभिषेक, शांतिधारा और पूजा-अर्चना करते हैं। णमोकार मंत्र का जाप करते हैं, स्वाध्याय, ध्यान और भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करते हैं। प्रचलित मंत्र—
“ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री आदिनाथ तीर्थंकराय नमः स्वाहा।”
इस दिन संयम, ब्रह्मचर्य, अहिंसा और कषायों के शमन का विशेष महत्व माना जाता है।
धर्मतीर्थ और दानतीर्थ का अद्वितीय संगम :
जहाँ भगवान ऋषभदेव ने धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया, वहीं राजा श्रेयांस ने दानतीर्थ की स्थापना की। यह संगम हमें यह संदेश देता है कि—
धर्म का वास्तविक स्वरूप दया, दान और संयम के समन्वय में ही निहित है।
समाज और जीवन के लिए प्रेरणा :
अक्षय तृतीया का पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन में—परोपकार की भावना विकसित करें,भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिकता को अपनाएँ। दान और सेवा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाएँ
अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अक्षय मूल्यों का उत्सव है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि सच्चा सुख भौतिक संपदा में नहीं, बल्कि त्याग, दान और संयम में निहित है। जैन परंपरा में यह तिथि विशेष रूप से आहारदान की पावन स्मृति के रूप में मनाई जाती है, जो मानवता को करुणा और सेवा का अमर संदेश देती है।
यदि हम इस पावन अवसर पर अपने जीवन में दान, संयम और सदाचार को स्थान दें, तो हमारा जीवन भी अक्षय पुण्य से आलोकित हो सकता है।
— डॉ. सुनील जैन ‘संचय’














