भारतीय इतिहास की चुप्पी और जैन सम्राटों की अनसुनी गाथा पर शोध अध्ययन हों
डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुरजैन धर्म के इतिहास में चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट खारवेल, राजा अमोघवर्ष, और चालुक्य/होयसल वंश के शासकों ने जैन धर्म को अत्यधिक संरक्षण दिया। इन राजाओं ने जैन विद्वानों को समर्थन दिया, गुफाएं बनवाईं और कर्नाटक व कलिंग (ओडिशा) में धर्म का प्रसार किया। चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम दिनों में दिगम्बर जैन साधु के रूप में जीवन व्यतीत किया।
भारत का इतिहास केवल तलवारों की टकराहट और साम्राज्यों के विस्तार की कथा नहीं है; यह विचारों, मूल्यों और जीवन-दर्शन की भी यात्रा है। दुर्भाग्य से, इस यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय “जैन सम्राटों का योगदान” इतिहास के पन्नों में या तो सिमट कर सीमित कर दिया गया है, या लगभग विस्मृत विलोपित कर दिया गया है।
जैन धर्म, जो अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मसंयम जैसे सार्वकालिक मूल्यों पर आधारित है, केवल मठों और तीर्थों में जीवित नहीं रहा; इसे राजसत्ता का भी संरक्षण मिला। यह तथ्य जितना ऐतिहासिक रूप से सत्य है, उतना ही आज के विमर्श में अनुपस्थित भी है इसके लिए शोधपरक संगोष्ठी आयोजित हो।
जब हम चन्द्रगुप्त मौर्य का स्मरण करते हैं, तो उन्हें प्रायः एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन उनके जीवन का अंतिम और शायद सबसे महत्वपूर्ण निर्णय जैन आचार्य भद्रबाहु के सान्निध्य में वैराग्य अपनाना इतिहास की मुख्यधारा में आध्यात्मिक चिंतन क्यों नहीं उभरता? क्या यह इसलिए कि त्याग वैराग्य की कथा, विजय की कथा से कम आकर्षक मानी जाती है?
इसी प्रकार सम्प्रति, जिन्हें ‘जैन अशोक’ कहा जाता है, ने जिस व्यापक स्तर पर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया, मंदिरों का निर्माण कराया और धर्मदूतों को दूर-दूर तक भेजा—वह किसी भी दृष्टि से एक सांस्कृतिक क्रांति से कम नहीं था। फिर भी, उनका नाम सामान्य पाठ्यक्रमों में लगभग अनुपस्थित है।
गुजरात के कुमारपाल ने तो एक कदम आगे बढ़कर शासन की आत्मा में ही जैन दर्शन को स्थापित किया। आज जब ‘नैतिक शासन’ की चर्चा होती है, तब कुमारपाल का उदाहरण क्यों नहीं दिया जाता?
दक्षिण भारत की वीरांगना रानी अब्बक्का चौटा इस परंपरा की एक और सशक्त कड़ी हैं। उन्होंने विदेशी आक्रमणों का सामना करते हुए न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा की, बल्कि जैन संस्कृति को भी संरक्षण दिया। उनका व्यक्तित्व यह सिद्ध करता है कि आस्था और प्रतिरोध एक साथ चल सकते हैं।
यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती। खारवेल से लेकर अमोघवर्ष प्रथम और दक्षिण के गंग वंश व होयसाल वंश तक—जैन धर्म को राजकीय संरक्षण देने वाले शासकों की एक लंबी परंपरा रही है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक भी थी।
फिर प्रश्न उठता है—इतिहास में यह मौन क्यों?
संभवतः इसका उत्तर इतिहास लेखन की प्रवृत्ति में छिपा है, जहाँ युद्ध, विस्तार और सत्ता संघर्ष को प्राथमिकता दी गई, जबकि अहिंसा, संयम और नैतिक शासन को अपेक्षाकृत कम महत्व मिला। जैन परंपरा का शांत, अनाक्रामक स्वभाव भी इस उपेक्षा का एक कारण हो सकता है। लेकिन अब यह मौन टूटना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि जैन सम्राटों की गौरवगाथा को केवल धार्मिक संदर्भ में नहीं, बल्कि भारत की समग्र सांस्कृतिक विरासत के हिस्से के रूप में पुनः स्थापित किया जाए। शैक्षिक पाठ्यक्रमों में संतुलन लाया जाए, शोध को प्रोत्साहन मिले और सार्वजनिक विमर्श में इन नामों को स्थान दिया जाए।
इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं होता; वह वर्तमान की चेतना और भविष्य की दिशा भी तय करता है। यदि हम अपने ही इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों को अनदेखा करेंगे, तो हमारी समझ अधूरी ही रहेगी।
जैन सम्राटों की गाथाएँ हमें यह सिखाती हैं कि शक्ति का सर्वोच्च रूप विजय नहीं, बल्कि संयम है; और शासन का सर्वोच्च आदर्श विस्तार नहीं, बल्कि करुणा है।
अब प्रश्न यह नहीं कि इतिहास ने उन्हें कितना स्थान दिया अब तो प्रश्न यह है कि हम उन्हें कितना स्थान देने के लिए तैयार हैं।












