दिगंबर जैन साधुओं का कठोर तपस्वी जीवन – गर्मी में भी संयम, त्याग और आत्मअनुशासन का अद्वितीय उदाहरण

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दिगंबर जैन परंपरा के साधुओं का जीवन अत्यंत कठोर, संयमित और तपस्या से परिपूर्ण माना जाता है। सांसारिक सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग कर आत्मशुद्धि, अहिंसा और मोक्षमार्ग प्राप्त करना ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य होता है।
इसी क्रम में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का जीवन अनुशासन और तपस्या का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे प्रतिदिन कड़ी धूप में समायिक करते हैं और तपते हुए वातावरण में भी निरंतर विहार करते हैं, जो उनके अद्वितीय आत्मसंयम और साधना को दर्शाता है।
गर्मियों में 40 से 42 डिग्री सेल्सियस के तीव्र तापमान में भी ये साधु नंगे पैर डामर की सड़कों पर प्रतिदिन लगभग 20 से 25 किलोमीटर तक विहार करते हैं। उनकी जीवनशैली में किसी भी प्रकार की आरामदायक सुविधाओं को स्वीकार नहीं किया जाता।
दिगंबर जैन साधुओं की आचारसंहिता के अनुसार वे दिन में केवल एक बार खड़े होकर आहार ग्रहण करते हैं। उसी समय पानी भी लिया जाता है और उसके बाद पूरे दिन भोजन या पानी ग्रहण नहीं किया जाता। इन नियमों का पालन अत्यंत अनुशासन और कठोरता से किया जाता है।
40–42 डिग्री तापमान में नंगे पैर विहार, दिन में केवल एक बार आहार और पानी ग्रहण करना तथा सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग करते हुए साधु जीवन के कठोर नियमों का पालन किया जाता है।
इन साधुओं के जीवन में एसी, पंखा, कूलर, स्नान, बिस्तर, गद्दा, चादर या तकिया जैसी किसी भी भौतिक सुविधा का स्थान नहीं होता। वे साधारण रूप से जमीन पर बैठते हैं और वहीं विश्राम करते हैं।
इस कठोर तपस्या के कारण शरीर पर काफी शारीरिक दबाव पड़ता है। विशेष रूप से नंगे पैर चलने के कारण पैरों के तलवों पर कठोर त्वचा बन जाती है, फिर भी साधु अपनी साधना में कोई समझौता नहीं करते।
जैन धर्म में इस परंपरा को अत्यंत पवित्र और आत्मकल्याण का मार्ग माना जाता है। संयम, अहिंसा और आत्मसंयम के सिद्धांतों पर आधारित यह जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक माना जाता है। श्रद्धालु बड़ी आस्था के साथ इन साधुओं के दर्शन के लिए आते हैं और उनके आशीर्वाद को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके जीवन का त्याग और साधना आध्यात्मिक ऊंचाई का प्रतीक मानी जाती है।
यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा और पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद द्वारा दी गई है।

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