धर्मतीर्थ सर्वोदय : जहां विद्यासागर जी, वहां है पंचकल्याणक

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एक बार उदबोधन देते हुए वीतरागी, दिगंबर जैन धर्म और सर्व  समाज में उतने ही लोक प्रिय संत जो संतत्व में विचरण करते-रहते हैं। जो महात्यागी हैं। स्वात्म के साथ पर हिताय चिंतक हैं।  जिनकी छबि चतुर्थ कालीन  चर्या का पावन दृश्य उपस्थित करती है, उन संत ने कहा था कि लोग ग्रीष्म ऋतु में घुमने को ठण्डे स्थान कश्मीर और शिमला आदि में आनंद मनाने जाते हैं। अमरकण्टक ऐसा स्थल है जहां आकर कश्मीर-शिमला की ठण्डक का आनंद लेते हुए धर्म-ध्यान भी कर सकते हैं।

मंदिर हमारी आत्म-आराधना और साधना के प्रेरक निमित्त हैं। ये हमारे चिंतन-मनन को स्फूर्त करते हैं। सांस्कृतिक चेतना के  प्रतीक हमारे तीर्थ होते हैं। जिनकी आस्था तीर्थों पर होती है, वे तीर्थों की मूल भावना से जुड़े सत्-पक्षों को जीवन में उतार कर, जीवन मूल्यों को जीकर, अपना जीवन उर्ध्वमुखी कर लेते हैं। संसार के प्राणियों के प्रति दया, करुणा और सेवा-भावना के माध्यम से लोक कल्याण करते हैं।  तपस्वी, ऋषि और  मुनि इसी कर्तव्य-भावना की पूर्ति में तीर्थों का निर्माण करते हैं।

भारत देश के, मध्यप्रदेश के वनप्रदेश की उपमा प्राप्त अनूपपूर  जिले के अंतर्गत, जीवनदायिनी रेवानदी नर्मदा सलिला, सोन (शोणभद्र) नदी  के पावन  उदगम स्थल एवं विंध्य सतपुड़ा मैकल पर्वत श्रेणियों का मिलन स्थल, भारत के ह्रदय स्थल है। वृक्षो से आच्छादित विख्यात वनभूमि अमरकण्टक नगर के सर्वोच्च मैकल पर्वत माला के शिखर पर श्री दिगम्बर जैन अमरकण्टक क्षेत्रीय विकास समिति, न्यास ने श्रद्धालुओं की आकांक्षा का ध्यान रखते हुए  ‘सर्वोदय तीर्थ’ के नाम से  एक भव्यतम और अतुलनीय  धर्म-तीर्थ का स्नप्न साकार कर दिया है। श्रीशांति-वीर-शिव-ज्ञानसागर आचार्य की शिष्य परंपरा में दीक्षित बालयोगी, संघनायक, परमश्रुत सर्वोदयी संत विश्ववंदनीय परमपूज्य संत शिरोमणि १०८  आचार्य प्रवर श्री विद्यासागरजी महामुनिराज की अध्यात्मिक परिकल्पना  के अनुसार विश्वव्यापी पहचान के अद्वितीय धर्म-ध्यान स्थल की स्थापना दी  है।

जैन संस्कृति का हजार वर्ष से अधिक आयु वाले , पाषाण जिनालय का बहु प्रतिक्षित श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याण जिनबिंब  प्राण-प्रतिष्ठा गजरथ महामहोत्सव युग शिरोमणि, अध्यात्म योगी, धर्म दिवाकर  श्री विद्यासागर ऋषिराज जी ससंघ के सुसानिध्य में शनिवार  २५ मार्च से  २ अप्रैल  २०२३ अर्थात् चैत्र शुक्ल-४ से रविवार चैत्र शुक्ल १२ तक पाषाण से परमात्मा बनाने का आयोजन आयोजित हो रहा  है। वाणी भूषण, बालब्रह्मचारी विनयकुमार जी, बण्डा, निवासी सुप्रतिष्ठित पारंगत प्रतिष्ठाचार्य  के माध्यम से सम्पन्न हो रहा है। देवरी (जिला-सागर) मध्यप्रदेश का निवासी परिवार, धर्मपरिपालक सवई सिंघई राजेन्द्र-विमला, सुरेश-सुलोचना, मिट्टन- सुलोचना, उत्तम-प्रेमलता, प्रवीण-शकुन, विनोद-रंजना, प्रमोद-सरिता का आत्म कल्याण के जिन जिनालय के  निर्माण संकल्प साक्षात होकर, मूर्त रूप ग्रहण कर चुका है।

शहरी प्रदूषण से दूर,  समुद्र सतह से लगभग साढ़े ३ हजार फूट की उंचाई पर वन औषधियों से भरा पूरा वनप्रदेश अमरकण्टक की  मैकल पर्वत माला के शिखर में राजस्थान के बंसी पहाड़ के गुलाबी पाषाण से ओड़िशी स्थापत्य शैली से सर्वोदय तीर्थ मंदिर को आकार मिला है। परम आदितीर्थंकर, परम आराध्य, आदिजिनेश्वर, ऋषभनाथ, आदिनाथ जी प्रथम जिनेश्वर के अद्भुभुत जिनालय को शताब्दी के अपराजय आत्म साधक, दिगम्बराचार्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनि महाराज की मंगल प्रेरणा, आशीर्वाद और भावना का यह अनुपम रूप है। भारत की प्राचीन पद्धति से बनाए गए इस जिन मंदिर जी में लोहे और सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। पाषाण को राजस्थान के कुशल शिल्पकारों ने तराश कर गुड़ के मिश्रण से आदिकालिन निर्माण की तकनीक का प्रयोग करते हुए चिपकाया गया है। दीवारों, मण्डप, स्तंभों पर कारीगरों ने कला को उकेरा है। जिनालय और मान स्तंभ को निर्माण की ड्राइंग-डिजाइन आर्किटेक्ट श्री सी बी सोमपुरा, अहमदाबाद ने तैयार की है।

२० वर्षों के अनथक और अनवरत् प्रयासों के सुफल के परिणामस्वरूप आदितीर्थेश्वर का पाषाण का विशाल और भव्य, अनुपम, मनोज्ञ  कलात्मक १७१ फूट उतुंग गगनचुंबी जिनालय निर्मित हुआ है। भूकंप के प्रभाव से सुरक्षित यह
धर्म लोक का अतिशयी मंदिर मोक्षमार्ग के आराधक विद्यासागर जी की सूझबूझ का उपादान और उपहार है। इस
धर्मक्षेत्र प्रांगण का क्षेत्रफल ३ लाख वर्गफूट है। 21 मई 2002 के शुभ मुहूर्त में दानवीर भामाशाह आर. के. मार्बल के
उदारमना अशोक जी पाटनी के कर कमलों से शिलान्यास सम्पन्न हुआ था।

3 सितंबर 2006 की परम पावन घड़ी में मूकमाटी अमर महाकाव्य के रचयिता आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी मुनि महाराज व ससंघ के सानिध्य में पाषाण के ‘सिंहद्वार’ और ‘मानस्तंभ’ का भूमि पूजन किया गया था। सिंहद्वार: का आकार ऊंचाई 51 फूट, लंबाई 86 फूट और चौड़ाई 20 फूट की है। इसके दानदाता प्रमोद जी सिंघई परिवार बिलासपुर-दिल्ली हैं। मानस्तंभ: इसे जिनालय के सामने 81 फूट ऊंचा, 42 फूट चौड़ा और 42 फूट लंबे मानस्तंभ के निर्माण के लिए यागदान  कर्ता  प्रभात जी जैन, परिवार मुंबई हैं।

जन-जन के आराध्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी जिनदेवता की अष्टधातु से निर्मित पदमासन लोक
चित्तहारी, अतुलनीय  प्रतिमा जी जिसका वजन ही 24 टन, ऊंचाई 9 फूट और चौड़ाई 9 फूट है।प्रतिमा जी की भव्यता के अनुरूप अष्टधातु का  कमल जिस पर प्रतिमा जी विराजित है, वजन 17 टन, ऊंचाई 3 फूट है।

निर्मलकुमार पाटोदी,
विद्या-निलय, 45 शांति निकेतन कॉलोनी,
बॉम्बे हॉस्पिटल के पीछे, इंदौर-452-010 मध्यप्रदेश

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