विद्यार्थी जीवन की वास्तविक पूँजी: अनुशासन, धैर्य और संस्कारों का अवलंब

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शिक्षा केवल सूचनाओं का संचय नहीं, बल्कि आत्म-बोध और चरित्र-निर्माण की एक सतत प्रक्रिया है। भारतीय संस्कृति में विद्यार्थी का अर्थ ही वह है जो विद्या की अर्थी यानी याचना करता हो, और याचक कभी अहंकारी नहीं होता। किंतु आज के चकाचौंध भरे युग में विद्यार्थी जीवन की परिभाषा बदलती दिख रही है। वर्तमान पीढ़ी जहाँ तकनीक और बौद्धिक दक्षता में श्रेष्ठ है, वहीं संस्कारों, धैर्य और अनुशासन की कसौटी पर एक रिक्तता का अनुभव हो रहा है। आज के युवाओं के व्यवहार में जो ‘हेकड़ी’ या अनावश्यक आत्मविश्वास दिखता है, वह वास्तव में उनके व्यक्तित्व की नींव को खोखला कर रहा है। यह समय आत्म-चिंतन का है कि हम केवल साक्षर समाज बना रहे हैं या एक सुसंस्कृत राष्ट्र?
इतिहास गवाह है कि इस धरा पर जितने भी ‘ज्ञानी जीव’ या महापुरुष हुए हैं, उनकी महानता का रहस्य केवल उनकी बुद्धि नहीं, बल्कि उनका वज्र जैसा अनुशासन था। अनुशासन कोई बाहरी बंधन नहीं है जिसे किसी संस्थान या समाज द्वारा थोपा जाए; यह तो वह आंतरिक व्यवस्था है जो हमारी ऊर्जा के बिखराव को रोकती है। जैसे एक नदी यदि अपने किनारों के अनुशासन को त्याग दे तो वह केवल विनाशकारी बाढ़ बन जाती है, ठीक वैसे ही बिना अनुशासन के विद्यार्थी की प्रतिभा और मेधा कुंठित होकर समाज के लिए घातक सिद्ध होने लगती है। जीवन में किसी भी संस्था, कार्यस्थल या संगठन का हिस्सा बनने पर आपकी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितने चतुर हैं, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि आप कितने मर्यादित और अनुशासित हैं।
आज के परिवेश में ‘धैर्य’ का अभाव एक गंभीर व्याधि बन चुका है। ‘तत्काल सफलता’ की अंधी दौड़ ने युवाओं से उनकी सहनशीलता छीन ली है। परिणामतः, जीवन के सामान्य उतार-चढ़ावों में भी वे संतुलन खो देते हैं। हमें यह समझना होगा कि जीवन के संघर्ष ही हमें परिपक्व बनाते हैं। जैसे सोने को कुंदन बनने के लिए आग में तपना पड़ता है, वैसे ही विद्यार्थी को जीवन की चुनौतियों और विफलताओं को सहर्ष स्वीकार करना सीखना होगा। हार और जीत जीवन के दो पहलू हैं; सफलता में उन्माद से बचना और असफलता में अवसाद से दूर रहना ही वास्तविक शिक्षा है।
बड़ों का आदर और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता का भाव आज के आधुनिकतावादी परिवेश में धूमिल होता जा रहा है। यह विडंबना ही है कि जो हाथ ज्ञान का दीप जलाते हैं, आज की पीढ़ी उन्हीं पर प्रश्नचिह्न लगा रही है। बड़ों का अनुभव वह सुरक्षा कवच है जो हमें जीवन की अदृश्य खाइयों में गिरने से बचाता है। सम्मान देना कमजोरी नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ व्यक्तित्व का परिचायक है। जहाँ सम्मान का भाव समाप्त हो जाता है, वहाँ सीखने की प्रक्रिया भी रुक जाती है। एक अहंकारी मन कभी नया ज्ञान ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वयं के ‘होने’ के मद में चूर रहता है।
अंततः, शिक्षा का वास्तविक सरोकार अंकों की तालिका से नहीं, बल्कि व्यवहार की शालीनता से है। वर्तमान पीढ़ी को यह समझना होगा कि ‘हेकड़ी’ और उग्रता क्षणिक आकर्षण तो दे सकती है, किंतु सम्मान केवल ‘विनय’ से ही प्राप्त होता है। यदि आज का विद्यार्थी अनुशासन को अपना स्वभाव, धैर्य को अपना आधार और मर्यादा को अपना आचरण बना ले, तो वह न केवल अपने करियर के शिखर को छुएगा, बल्कि जीवन के हर संघर्ष को एक उत्सव की तरह जीने का सामर्थ्य भी प्राप्त करेगा। याद रखें, संस्कारित शिक्षा ही वह प्रकाश है जो भविष्य के अंधकार को चीरने की शक्ति रखती है।
​”विद्या फलती विनय से, अनुशासन आधार।
धैर्य धारि जो पग बढ़े, जीतें सब संसार॥”
​भावार्थ: विद्या तभी फलदायी होती है जब उसमें विनम्रता हो और जीवन का आधार अनुशासन हो। जो व्यक्ति धैर्य धारण कर आगे बढ़ता है, वह पूरे संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है।
मयंक जैन
मंगलायतन विश्वविद्यालय अलीगढ़

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