मतभेद से मनभेद तक: जैन संस्थाओं के सामने गंभीर चुनौती ✍️डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर

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मानव समाज विचारों की विविधता से निर्मित है। जहाँ अनेक व्यक्ति होंगे, वहाँ अनेक मत होंगे। यह स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। भिन्न विचार ही विकास के मार्ग खोलते हैं, नई योजनाओं को जन्म देते हैं और संगठन को जीवंत बनाए रखते हैं। परंतु जब मतभेद मनभेद में बदल जाते हैं, तब वही संगठन दुर्बल होने लगता है।
मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद विनाशकारी। मतभेद विचारों का अंतर है, जबकि मनभेद हृदयों की दूरी है। मतभेद में संवाद जीवित रहता है, पर मनभेद में मौन, कटुता और दूरी घर कर जाती है। मतभेद व्यक्ति को सोचने पर विवश करते हैं, पर मनभेद संबंधों को तोड़ने लगते हैं।
आज समाज, परिवार, संगठन और मित्रता—हर क्षेत्र में यह समस्या बढ़ती दिखाई देती है। छोटी-सी असहमति बड़े विवाद का कारण बन जाती है। लोग विचारों पर चर्चा कम और व्यक्तियों पर आक्रमण अधिक करने लगे हैं। तर्क का स्थान कटाक्ष ने ले लिया है, संवाद का स्थान आरोपों ने और सहमति की संभावना का स्थान अहंकार ने। यही कारण है कि जहाँ प्रेम होना चाहिए वहाँ तनाव है, जहाँ अपनापन होना चाहिए वहाँ दूरी है।
वास्तव में मतभेद तो ज्ञान के द्वार खोलते हैं। यदि सब एक ही प्रकार सोचें, तो नई दिशा कैसे मिले? नए विचार कैसे जन्म लें? मतभेद हमें सिखाते हैं कि सत्य एकांगी नहीं, बहुआयामी होता है। दूसरों की बात सुनना, उनकी दृष्टि समझना और अपनी सीमाओं को पहचानना—यह सब मतभेदों से ही संभव होता है।
किन्तु जब मतभेद के साथ अहंकार जुड़ जाता है, तब मनभेद जन्म लेते हैं। मनुष्य विचार से अधिक स्वयं को सही सिद्ध करने में लग जाता है। वह सामने वाले की बात सुनना नहीं चाहता, केवल अपनी बात मनवाना चाहता है। यहीं से संबंधों की दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि विचार बदल सकते हैं, पर रिश्ते टूट जाएँ तो उन्हें जोड़ना कठिन होता है। किसी विषय पर असहमति हो सकती है, पर किसी व्यक्ति से घृणा क्यों? कोई हमारे मत से सहमत न हो, तो भी वह सम्मान का अधिकारी है। सभ्यता का अर्थ यही है कि हम असहमति में भी आदर बनाए रखें।
आज आवश्यकता है सहिष्णुता की, सुनने की कला की और विनम्रता की। यदि हम हर मतभेद को युद्ध न मानें, बल्कि सीखने का अवसर मानें, तो अनेक मनभेद स्वतः समाप्त हो जाएँगे। हमें यह सीखना होगा कि “मैं सही हो सकता हूँ, पर दूसरा भी पूर्णतः गलत नहीं हो सकता।”
आज यह चिंता विशेष रूप से अनेक जैन संस्थाओं में दिखाई देने लगी है। जैन समाज त्याग, संयम, अहिंसा, अनेकांत और समन्वय की महान परंपरा का वाहक है। जिस दर्शन ने संसार को अनेकांतवाद का संदेश दिया, जहाँ सत्य को बहुआयामी माना गया, जहाँ विरोध नहीं बल्कि समन्वय को महत्व दिया गया—यदि उसी समाज की संस्थाओं में कटुता, गुटबंदी और परस्पर द्वेष बढ़ने लगे, तो यह आत्ममंथन का विषय है।
आज देखने में आता है कि अनेक जैन संस्थाओं में छोटे-छोटे विषय बड़े विवादों का रूप ले लेते हैं। पदों की प्रतिस्पर्धा, निर्णयों पर असहमति, व्यक्तिगत आग्रह, मान-सम्मान की अपेक्षा, पीढ़ियों के बीच संवादहीनता, और कभी-कभी स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियाँ—ये सब मतभेदों को मनभेद में बदल देती हैं। परिणाम यह होता है कि संस्था का समय समाजसेवा में कम और आंतरिक संघर्षों में अधिक व्यतीत होने लगता है।
जब किसी संस्था में मतभेद बढ़ते हैं, तो सबसे पहले उसकी ऊर्जा नष्ट होती है। जो शक्ति धर्मप्रभावना, शिक्षा, संस्कार, सेवा, तीर्थ संरक्षण, युवाओं के मार्गदर्शन और समाज उत्थान में लगनी चाहिए, वही शक्ति आरोप-प्रत्यारोप में खर्च होने लगती है। नई पीढ़ी ऐसे वातावरण को देखकर संस्थाओं से दूर होने लगती है। समाज के सामान्य सदस्य भी निराश हो जाते हैं।
यह स्मरण रखना चाहिए कि मतभेद होना दोष नहीं है। विचार अलग होना संगठन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किसी योजना पर भिन्न मत हो सकते हैं, कार्यपद्धति पर अलग दृष्टिकोण हो सकता है, नेतृत्व शैली पर प्रश्न उठ सकते हैं—परंतु इन सबका समाधान संवाद से होना चाहिए, संघर्ष से नहीं। मतभेद यदि मर्यादा में रहें तो संस्था को मजबूत करते हैं, क्योंकि वे नए विचार लाते हैं। लेकिन मनभेद संस्था को भीतर से खोखला कर देते हैं।
जैन दर्शन का अनेकांतवाद हमें सिखाता है कि सत्य केवल हमारे पास नहीं है। सामने वाले के विचार में भी सत्य का अंश हो सकता है। यदि इस सिद्धांत को संस्थागत जीवन में उतार लिया जाए, तो अधिकांश विवाद समाप्त हो सकते हैं। स्याद्वाद हमें संयमित भाषा सिखाता है, और अहिंसा केवल कर्म से नहीं, वचन और विचार से भी अपेक्षित है। कटु शब्द भी हिंसा हैं, अपमान भी हिंसा है, और द्वेष भी हिंसा है। संस्था पर अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व होना चाहिए। वर्चस्व नहीं, सहभागिता होनी चाहिए।
राजनीतिक जीवन में भी हम अक्सर देखते हैं कि अनेक नेता मंचों पर एक-दूसरे की तीखी आलोचना करते हैं, आरोप लगाते हैं, कटु शब्द भी बोलते हैं। चुनावी सभाओं में वे प्रतिद्वंद्वी दिखाई देते हैं, परंतु व्यवहारिक जीवन में अनेक अवसरों पर वही नेता एक साथ बैठकर चर्चा करते, भोजन करते, सुख-दुःख में सहभागी होते और औपचारिक संबंध निभाते दिखाई देते हैं। वे समझते हैं कि वैचारिक विरोध और व्यक्तिगत संबंध दो अलग विषय हैं। यदि राजनीति में यह परिपक्वता संभव है, तो धर्म और समाज की संस्थाओं में तो यह और अधिक दिखाई देनी चाहिए।
आज आवश्यकता है कि जैन संस्थाएँ कुछ मूल सूत्र अपनाएँ—
🔴निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी हो।
🔴वरिष्ठों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा साथ चले।
🟢पद सेवा का माध्यम बने, प्रतिष्ठा का साधन नहीं।
🟤असहमति को सम्मानपूर्वक सुना जाए।
⚫आलोचना के स्थान पर रचनात्मक सुझाव की परंपरा विकसित हो।
🔘व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठकर सामूहिक हित को प्राथमिकता दी जाए।
🔵यह भी आवश्यक है कि संस्थाओं में समय-समय पर संवाद सभाएँ हों, जहाँ बिना कटुता के खुलकर विचार रखे जा सकें। यदि लोग सुने जाएँगे, तो वे टूटेंगे नहीं। यदि सम्मान मिलेगा, तो विद्रोह नहीं होगा। यदि अपनापन रहेगा, तो मतभेद भी मधुर रहेंगे।
जैन समाज का इतिहास त्यागी आचार्यों, मुनियों, आर्यिकाओं, विद्वानों और श्रावकों की महान परंपरा से प्रकाशित है। जिन्होंने अपना जीवन समाज और धर्म के लिए समर्पित किया, उनकी विरासत को हम आपसी कलह से दुर्बल न करें। संस्थाएँ व्यक्तियों से बड़ी होती हैं, और समाज संस्था से भी बड़ा।
अतः समय की पुकार है—मतभेद रहें, क्योंकि वे विचारों को जन्म देते हैं; पर मनभेद न हों, क्योंकि वे संगठन को तोड़ देते हैं।
जैन संस्थाएँ यदि अपने मूल सिद्धांत—अहिंसा, अनेकांत, क्षमा और समन्वय—को व्यवहार में उतार लें, तो वे पुनः समाज की प्रेरणाशक्ति बन सकती हैं।
आइए संकल्प लें—
हम पद से नहीं, उद्देश्य से जुड़ेंगे।
हम व्यक्तियों से नहीं, मूल्यों से चलेंगे।
हम मतभेद रखेंगे, पर मनभेद नहीं होने देंगे।

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