भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम सेसिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि पहले ज्ञान करो फिर दया का पालन करो। मोही जीव की विपरीत गति विपरीत मति, विपरीत क्रियाएं होती है।
बहिरात्मा स्वयं को देह रूप मानता है.। स्वयं को काला गोरा लंबा सुंदर कुरूप मानता है देह में स्वबुद्धि लगाता है। निश्चय से शरीर को मेरा मानना मिथ्यात्व है व्यवहार से तो सम्यक दृष्टि भी शरीर को मेरा मानता है उसकी सुरक्षा करता है भोजन औषधि आदि देता है।
आत्मा के अनंत गुण है उसमे स्वयं को जानना वह आत्मा का महानतम गुण है। आत्म श्रद्धान से दया करुणा दान सबका पुण्य अनंत गुना हो जाता है। संसार का मूल कारण मिथ्यात्व है शरीर को मैं मानना महानतम मिथ्यात्व है। अंतरात्मा से ही परमात्मा बन सकते हैं। आत्मा को परमात्मा बनाने का लक्ष्य रखना चाहिए। जो मनुष्य सन्यक दर्शन से रहित है वह कई वर्षों की तपस्या करें परंतु वह परमात्मा नहीं बन सकता। शरीर को मैं मानने वाला ही संपूर्ण पाप करता है अन्याय अत्याचार भ्रष्टाचार मिलावट दुर्व्यवहार आदि करता है। देव दर्शन निज दर्शन है। द्रव्य अपेक्षा जीव द्रव्य एक है। मैं ही परमात्मा हूं यह विश्वास होना चाहिए। जिसको सम्यक दर्शन होगा उसके अंतःकरण में अंतर मुहूर्त में यह विश्वास अवश्य होगा। मेरा उत्थान में ही कर सकता हूं यह आत्मविश्वास करना अंतर आत्मा है।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता आओ धीरे-धीरे चेतन एकत्व भाव में। द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
Unit of Shri Bharatvarshiya Digamber Jain Mahasabha











