मुरैना/सांगानेर (मनोज जैन नायक) वर्तमान में चल रही धमाचौकड़ी से हृदय द्रवित है । सच में दिल दुखाने वाली बात है। हम साधर्मी समाज के लोग, जो हमेशा अपने धर्म, अपने तीर्थ और अपने धार्मिक रीतिरिवाज़ों पर गर्व करते हैं । आज वहीं अपने भगवान नेमिनाथ की मोक्ष भूमि गिरनार पर्वत को बचाने में कमजोर पड़ते दिख रहे हैं।
। हम कहते हैं कि हम मजबूत हैं, पढ़े-लिखे हैं, धन धान से सम्पन्न हैं। देश में सबसे ज्यादा टैक्स देने वालों में से हैं। ठीक है, मान लिया। पर जब अपने ही तीर्थ की बात आती है, तो हम सब खामोश क्यों हो जाते हैं ?
। बड़ी-बड़ी संस्थाएं, बड़े-बड़े मंच, ग्रुप, नेता, सब जैसे चुप बैठे हैं। और हम आम लोग? बस मोबाइल उठाकर पोस्ट डाल देते हैं—“Save Girnar”… लेकिन सच बोलें तो इससे कुछ नहीं बदलता।
सबसे बड़ी बात— जिस राजनीतिक पार्टी पर हमने भरोसा किया, अगर उसी के कुछ नेता हमारे तीर्थ और हमारी आस्था के खिलाफ खड़े नजर आते हैं, तो क्या हम यूँ ही चुप रहेंगे ? समर्थन अंधा नहीं होना चाहिए—जहाँ अपने धर्म और सम्मान की बात हो, वहाँ सवाल करना भी ज़रूरी है।
। आज एक सवाल खुद से पूछो— कल जब अपनी अगली पीढ़ी हमें देखेगी, तो हम क्या जवाब देंगे ? यह कि हमने उन्हें अच्छी शिक्षा तो दी, लेकिन अपने ही धर्म और तीर्थ की रक्षा के समय हम पीछे हट गए ?
अगर हमारे पास सच है, प्रमाण है, तो आवाज़ उठाने से डर कैसा ? आज अगर हम गिरनार पर्वत के लिए नहीं खड़े हुए, तो कल शिखर जी के लिए भी शायद देर हो जाएगी।
सिर्फ “हम जैन हैं” बोलने से या लिखने से कुछ नहीं होता, अगर सच में हैं, तो दिखाना भी पड़ेगा। जागो समाज बंधुओं… क्योंकि कल इतिहास पूछेगा—तुम थे, फिर भी चुप क्यों थे ?
भाव लेखक
अंशुल जैन “शास्त्री”











