स्वाद के पीछे भागता समाज, सेहत से दूर होता जीवन

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स्वाद के पीछे भागता समाज, सेहत से दूर होता जीवन
(जंक फूड की स्टार रेटिंग क्यों नहीं होती?)
✍️डॉ. सुनील जैन ‘संचय’
आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने भोजन को भी सुविधा का विषय बना दिया है। कभी रसोई की धीमी आँच पर पकने वाला भोजन परिवार, परंपरा और स्वास्थ्य का प्रतीक था; आज उसकी जगह रंगीन पैकेटों, आकर्षक विज्ञापनों और त्वरित स्वाद ने ले ली है। बाजार की चमक ने थाली का स्वरूप बदल दिया है। अब भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उपभोग की वस्तु बनता जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न अनिवार्य हो उठता है—जो हम खा रहे हैं, क्या वह सचमुच हमारे शरीर का मित्र है?
जंक फूड की सबसे बड़ी शक्ति उसका स्वाद नहीं, उसका भ्रम है। वह स्वादिष्ट दिखता है, तुरंत उपलब्ध होता है, और क्षणिक आनंद देता है। परंतु इस क्षणिक सुख के पीछे दीर्घकालिक हानि का मौन संसार छिपा रहता है। अत्यधिक नमक, चीनी, परिष्कृत मैदा, असंतुलित वसा और कृत्रिम तत्वों से बने ये खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे शरीर की स्वाभाविक लय को बाधित करते हैं। जो वस्तु जीभ को प्रिय लगती है, वही शरीर के लिए बोझ भी बन सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भोजन के पैकेट पर केवल आकर्षक चित्र न हों, बल्कि स्पष्ट सत्य भी लिखा हो। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि वह जो खरीद रहा है, उसमें पोषण कितना है और खतरा कितना। जैसे दवाओं पर चेतावनी लिखी जाती है, वैसे ही अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर भी साफ संकेत होने चाहिए। यदि किसी वस्तु में नमक, चीनी या वसा अत्यधिक है, तो यह जानकारी छिपी नहीं, सामने होनी चाहिए।
यह केवल सरकारी नियम का विषय नहीं, जनस्वास्थ्य का प्रश्न है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अनेक जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ आज तेजी से बढ़ रही हैं। इन रोगों की जड़ में केवल निष्क्रिय जीवनशैली नहीं, बल्कि गलत खान-पान भी है। बच्चे और युवा वर्ग विशेष रूप से विज्ञापनों के प्रभाव में आकर ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन कर रहे हैं, जिनके दुष्परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देते, पर वर्षों बाद गंभीर रूप में सामने आते हैं।
कितनी विडंबना है कि हम मोबाइल खरीदते समय उसकी बैटरी, कैमरा और फीचर पढ़ते हैं, पर भोजन खरीदते समय उसकी सामग्री तक नहीं देखते। हम वस्तुओं के लिए सतर्क हैं, पर अपने शरीर के लिए लापरवाह। जबकि शरीर ही वह आधार है, जिस पर जीवन की पूरी इमारत खड़ी है। यदि स्वास्थ्य डगमगा जाए, तो सुविधा, संपत्ति और सफलता सब फीकी पड़ जाती है।
स्पष्ट लेबलिंग और स्टार रेटिंग जैसी व्यवस्थाएँ इसलिए आवश्यक हैं कि उपभोक्ता भ्रम से मुक्त होकर निर्णय ले सके। यदि किसी पैकेट पर सरल भाषा में यह अंकित हो कि यह खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य की दृष्टि से कितना सुरक्षित या हानिकारक है, तो व्यक्ति अधिक सजग होगा। बाजार में प्रतिस्पर्धा तब केवल स्वाद की नहीं, गुणवत्ता की भी होगी।
पर समाधान केवल नियमों से नहीं आएगा। परिवारों को भी अपनी भोजन संस्कृति पर पुनर्विचार करना होगा। बच्चों को घर का भोजन, ताजे फल, अनाज, दालें और पारंपरिक पौष्टिक व्यंजन प्रिय बनाना होंगे। यदि घर की थाली समृद्ध होगी, तो बाज़ार के पैकेटों का आकर्षण स्वयं कम होगा। भोजन केवल स्वाद नहीं, संस्कार भी है।
समाज को यह समझना होगा कि रोग अचानक नहीं आते; वे धीरे-धीरे हमारी आदतों से जन्म लेते हैं। हर बार जब हम सुविधा को स्वास्थ्य पर चुनते हैं, तब भविष्य में बीमारी की एक ईंट रख देते हैं। और हर बार जब हम संतुलित भोजन चुनते हैं, तब स्वस्थ जीवन की नींव मजबूत करते हैं।
समय आ गया है कि हम चमकदार पैकेटों से अधिक उनके भीतर की सच्चाई पढ़ें। स्वाद क्षण भर का आनंद दे सकता है, पर स्वास्थ्य जीवन भर का उत्सव है। इसलिए अगली बार जब हाथ किसी जंक फूड की ओर बढ़े, तो जीभ से पहले विवेक से पूछिए—क्या यह केवल स्वाद है, या मेरे स्वास्थ्य की कीमत पर खरीदा गया भ्रम?

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