दिवाली यानि अन्धकार से प्रकाश की ओर, दु:ख से सुख की ओर, पाप से पुण्य की ओर प्रसन्न सागर’ जी

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औरंगाबाद संवाददाता  नरेंद्र पीयूष जैन। परमपूज्य परम तपस्वी अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर’ जी महामुनिराज सम्मेदशिखर जी के स्वर्णभद्र कूट में विराजमान अपनी मौन साधना में रत होकर अपनी मौन वाणी से सभी भक्तों को प्रतिदिन एक संदेश में बताया कि चेहरे से पहचान होती है और चरित्र से परख दिवाली यानि अन्धकार से प्रकाश की ओर, दु:ख से सुख की ओर, पाप से पुण्य की ओर। दिवाली पर्व हमें आत्मिक सुख की प्रेरणा देता है। दिवाली पर्व असत्य से सत्य की राह बताता है, इसलिए रात जितनी काली होगी सुबह उतने ही करीब होगी।
भगवान महावीर का निर्वाण हमारे जीवन में तभी फलीभूत होगा, जब हम उनके पथानुगामी बनेंगे और उनके सन्देश को आत्मसात करेंगे। आज भगवान महावीर स्वामी ने 83 लाख 99 हजार 999 योनियों से मुक्ति प्राप्त की और जाते जाते अमृत सन्देश दे गये – जीओ और जीने दो। इस एक वाक्य में सभी धर्मों का मर्म समाहित हो गया।
दिवाली पर हम किसी का बुरा नहीं करने का संकल्प लें।
दिवाली पर हम – अपनी एक बुराई का तर्पण करें।
दिवाली पर हम – विवेक बुद्धि से कार्य करें।
दिवाली पर हम – मानवीय सेवा को सम्मान दें और प्रेम, करूणा, सेवा, भाई चारे का एक अखण्ड दीप जलायें और क्रूरता, निष्ठुरता, अमानवीयता की हवा से दीप को बचायें…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल

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