सुख का मूल कारण धर्म ही है इसलिए धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना…!!!।आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर

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औरंगाबाद संवाददाता नरेंद्र /पियुष जैन – परमपूज्य परम तपस्वी अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर’ जी महामुनिराज सम्मेदशिखर जी के बीस पंथी कोटी में विराजमान अपनी मौन साधना में रत होकर अपनी मौन वाणी से सभी भक्तों को प्रतिदिन एक संदेश में बताया कि सुख का मूल कारण धर्म ही है। इसलिए धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना…!!!।आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर’ जी जब आपकी पत्नी आपके सीने पर अपना सिर रखे, और आप से पूछे कि प्लीज जानू – बताओ ना — आपका कहीं ओर किसी से चक्कर तो नहीं है-? तो विश्वास किजिए – उस समय आपका जवाब महत्वपूर्ण नहीं है —
आप अपने दिल की धड़कन को कन्ट्रोल करना अन्यथा पत्नी द्वारा आपका नार्को टेस्ट हो जायेगा.. जरा सी धड़कन बढ़ी कि खेल खत्म..!

आज तक बड़े-बड़े महापुरुष भी नहीं समझ पाये कि सुख का कारण क्या है-? यदि सुख का कारण पत्नी है तो ऐसी अनेक पत्नियां है, जिन्होंने अपने पति को ही मार डाला – प्रेमी के लिए, धन के लिए, या और भी अन्य कारण हो। यदि आंकड़े देखे जाये, तो 100 में से 5 लोग भी नहीं मिलेंगे, जो पत्नी के सुख से सुखी हो। संसार में एक ही रिश्ता ऐसा है जो बिन कारण से लड़ता झगड़ता है – वो है पति पत्नी।

एक पत्नी से तीन कार्य हो रहे हैं। पत्नी पहले सुख देती है, फिर दुःख देती है और फिर बाद में ना जीने देती है, ना मरने। यदि पत्नी, बच्चे, घर, परिवार, मकान, महल, मोटर गाडी, खाना, पीना, कपड़े और भी बहुत कुछ चीजों से सुख मिलता तो बड़े-बड़े महापुरुष करोड़ो अरबों की धन सम्पत्ति छोड़कर क्यों वन की ओर प्रस्थान करते-? ये सुख ऐसा ही है जैसे – तलवार की धार पर शहद लगी हो। जो भी शहद खाएगा, उसे पहले शहद का मीठापन भायेगा, फिर जिन्दगी भर भागेगा और कहीं भी नही पहुंच पायेगा।

फिर प्रश्न उठता है – सुख कहाँ है-? पाप का फल – दुःख,, पुण्य का फल – सुख और धर्म का फल – सुख ही सुख। जो वस्तु जितनी मात्रा में धर्म से बनी है, वह उतनी मात्रा में ही सुख देती है। जितनी मात्रा में अधर्म और पाप होता है, उसका फल भी उतना ही मिलता है। दुःख का फल – नरक,, सुख का फल – स्वर्ग और धर्म का फल – मोक्ष। कहने का मतलब है – सुख का मूल कारण धर्म ही है। इसलिए धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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