दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं बच्चों का दिमाग-डा. मंगला

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यमुनानगर, 30 जनवरी (डा. आर. के. जैन):
आज कल माता पिता कम आयु में ही बच्चों को मोबाईल फोन दे देते हैं। बच्चे अभी विद्यालयों में भी नहीं जाते और माता-पिता बच्चों को मोबाईल पर गेम्स अथवा वीडियों दिखाने लगते हैं। जिससे की बच्चे माता-पिता को तंग ना करें तथा मोबाईल में ही व्यस्त रहें। इसी विषय पर जानकारी देते हुये मुकन्द लाल जिला नागरिक अस्पताल यमुनानगर की प्रधान चिकित्सा अधिकारी डा. दिव्या मंगला ने बच्चों की सेहत पर पड़ रहे मोबाईल के प्रभाव बारे जानकारी देते हुये बताया कि इस प्रकार बच्चे मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर होने लगते हैं, जिसे वर्चुअल ऑटिज्म भी कहा जाता है। अक्सर 4 से 5 साल के बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण देखने को मिलते है, इसका कारण कम उम्र में मोबाईल, टी. वी. अथवा लैपटोप पर रहना है। अधिकतर बच्चे वीडियों को केवल देखते रहते हैं, जिस कारण वे देरी से बोलना सिखते हैं, इसके अलावा वे अन्य बच्चों या बड़ों से बात करने से डरते हैं। ज्यादा समय मोबाईल या गैजेट्स का प्रयोग करने से बच्चों का स्पीच डैवलपमेंट नहीं होता। अत: बच्चे सामाजिक नहीं हो पाते तथा केवल आभासिय दुनिया में फंस कर रह जाते हैं। इसके कारण बच्चों के स्वभाव में भी परिवर्तन आता है, वे जीद्दी हो जाते है अथवा कई बार आक्रामक भी हो जाते हैं, जो समाज में बच्चों के विकास के लिये हानीकारक है। डा. मंगला ने सभी अभिभावकों को सलाह दी है कि वे अपने बच्चों को विशेषकर 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को तो मोबाईल फोन, गैजेटस् से दूर रखें तथा 5 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को भी केवल शिक्षा के उद्ेश्य से एक समय सीमा तक ही इन गैजेटस का प्रयोग करने दें। उन्होनें कहा कि बच्चों को आरम्भ से ही घर से बाहर सामान्य खेल अन्य बच्चों के साथ खेलने चाहिये, इससे उनका शारीरिक विकास तो होता ही है साथ ही बच्चे अन्य बच्चों के साथ सामाजिक व्यवहार भी सिखते हैं। डा. मंगला ने सलाह दी की माता-पिता को भी बच्चों के साथ समय बिताना चाहिये तथा उनकी दिनचर्या अथवा विद्यालय के ग्रहकार्य में सहयोग करना चाहिये, जिससे बच्चे तथा माता-पिता के मध्य प्रेम व घरेलू सामाजस्य स्थापित होता है और बच्चा स्वय् को सुरक्षित महसूस करता है। डा. दिव्या मंगला ने कहा कि लगातार मोबाईल फोन, टी. वी. अथवा गैजेटस् के प्रयोग से बच्चों की आंखों पर भी प्रभाव पड़ता है। आजकल कम आयु में ही बच्चों को चश्मा लग जाता है तथा विद्यालयों में भी शिक्षा के लिये मोबाईल-टैबलेट का प्रयोग कराया जाता है, जो बच्चों के भविष्य के लिये खतरनाक है। उन्होनें कहा कि मोबाईल-टैबलेट के प्रयोग पर भी अभिभावकों की निगरानी आवश्यक है, क्योंकि इंटरनेट के इस आधुनिक युग में अच्छी व बुरी दोनों प्रकार की सामग्री नेट पर उपलब्ध है, अत: अभिभावकों को इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि उनका बच्चा इस आधुनिकता का प्रयोग किस प्रकार कर रहा है। अभिभावकों को बच्चों को सही व गलत में अन्तर आरम्भ से ही सिखाना चाहिये। डा. मंगला ने वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण बारे जानकारी देते हुये बताया कि इससे शिकार बच्चे लोगों की उपस्थिती में बोलने से डरते हैं तथा बातचित के दौरान आई कॉन्टेक्ट से बचते हैं। अधिकतर लोगों व अपनी उम्र के बच्चों से भी घुलने-मिलने में परेशानी महसूस करते हैं तथा ऐसे बच्चों का आई-क्यू लैवल अर्थात सामान्य ज्ञान बहुत कम होता है। उन्होनें बताया कि ऐसे बच्चों का उपचार केवल माता-पिता द्वारा प्रेम से हो सकता है, इसके अलावा ऐसे बच्चों को स्पीच थैरेपी, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कोर्स, विशेष ऐजुकेशन थैरेपी व कॉउन्सलिंग द्वारा बच्चों में आत्मविश्वास का विकास किया जा सकता है। परन्तु उन्होने कहा कि बच्चों पर विशेष ध्यान देकर आरम्भ से ही ऐसी स्थीति से बचा जा सकता है।
फोटो नं. 1 एच.
जानकारी देती डा. दिव्या मंगला………………(डा. आर. के. जैन)

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