आधुनिकता का अभिशाप – तनाव

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विज्ञान अभिशाप या वरदान . जैसे लेनिन कहते थे धर्म एक प्रकार का अफीम हैं . हमारे देश में आज से करीब 80 साल पहले अंग्रेजों के समय में हर मोहल्ले में घर घर जाकर चाय मुफ्त में बांटी जाती थी. फिर चाय हमारे जीवन की आवश्यकता हो गयी. अब इसका छुड़ाना कठिनतम हो गया . न केवल चाय कोई भी आदत विशेष कर बुरी आदते हमारे जीवन में शीघता से प्रभाव डालती हैं .ये आदते व्यसन बन जाती हैं . व्यसन के कारण व्यक्ति उसी में डूबा रहता हैं .कभी कभी हमारे वैज्ञानिक आधुनिकता को जीवन का अनिवार्य अंग मानते हैं और उसके पक्ष और विपक्ष को मान्यता न देकर अपनी मान्यता को प्रमुखता देते हैं .
कुछ आधुनिक सामग्री का उपयोग हमारे लिए घातक होता जा रहा हैं ,पर युग के अनुरूप हमें प्रतिस्पर्धा करने के लिए अति आवश्यक बताया जा रहा हैं . हम अपने देश की बात नहीं कर रहे पर यह विश्व व्यापी समस्या होती जा रही हैं . ब्रिटेन की एक संस्था एन. एस. पी. सी .सी. की रिपोर्ट ;;11 वर्ष से 18 वर्ष के किशोरों में बढे 14 % अवसाद और ख़ुदकुशी के मामले .उस संस्था के अनुसार फेस बुक ,ट्विटर और इस्टाग्राम जैसी साइट्स का “.इन शिकार” इन आधुनिक साइट्स की इतनी अधिक आदत हो गयी हैं कि वे दुनिया से कट जाते हैं कई बार इससे उबरने के लिए जरुरत से ज्यादा नींद की गोलिया लेना,नसें काट लेना और खुद को आग के हवाले कर लेना और कुछ आत्महत्या की कोशिश .आजकल मोबाइल टेब हर बच्चे के हाथ पहुच गया हैं तो सरकार को इसकी शुरुआत स्कूल से करनी चाहिए .बच्चो को अवसाद से निपटने की शिक्षा भी दी जाए .
हम करीब 40 वर्ष पूर्व का चित्रण देखे उस समय कैलकुलेटर की शुरुआत का दौर था. उसने हमारी गणित की शक्ति को सरल बनाया. उसके कारण पहले हम बुनियादी गणित दूनिया,पाँव ,अडिय्या मौखिक याद कर उत्तर बता देते थे .उसने छोटे से छोटे व्यापारी ,बच्चों को उस पर आश्रित कर दिया .क्या यह अच्छी परंपरा हैं .? फिर 35 वर्ष टी वी संक्राति ने हमारे समाज पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षय प्रहार किया . हमारा आपसी मिलना जुलना समाप्त हम अपने घर में घुस कर रह गए. हमने सामाजिकता को त्याग दिया . हर घर में इसका इतना अधिक प्रभाव पड़ा की हमारा व्यक्तिगत ,पारिवारिक दायरा संकुचित हो गया . आज स्थिति यह हैं कि हम एकाकी जीवन को जीने के आदि हो गए. हमारा भाई चारा समाप्त . आज चिंतन की धारा शुष्क हो गयी. उसके माध्यम से हमें जो परोसा जा रहा हैं उसे हम स्वीकार कर रहे हैं .हमारी मौलिक चिंतन धारा नहीं रही हम काल्पनिक दूनिया में जीने के आदी हो गए. इससे हमारा ज्ञान वर्धन हुआ पर सामाजिकता को त्याग कर. इस बुध्धु बॉक्स ने हमारा समय अधिकतता से नष्ट किया . हमारा जीवन टी .वी के हिसाब से चल रहा हैं ,इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं को ,और बच्चों पर पड़ा ,आज यह व्यसन हो चूका . हर सिक्के के दो पहलु हैं .लाभ और हानि .जिसने जो किया उसने पाया .में कभी कभी सोचता हु यदि मेरे समय इसका प्रचलन शुरू हो गया होता तो संभव था में जो बना वह न बन पता ,जो जितना लेखन ,चिंतन ,मनन करता था वह न हो पाता .आज भी कभी कभी सुनने और पड़ने में आता हैं कि टी वी के कारण झगडे हो जाते हैं ,परिवार में बिखराव होते हैं और हत्या या आत्म हत्या तक हो जाते हैं ,वर्तमान में छोटे बच्चों को टी.वी.सामने बैठाकर खाना खिलाते हैं .टी वी ने सब मानवीयता को समाप्त कर दिया . नाना नानी,दादा दादी का स्थान टी.वी ने ले लिया. बच्चों का जो उपयोगी समय पसंदगी वाले सीरियल के बाद शुरू होता हैं इसी कारण कोचिंग संस्कृति विकसित हुई .टी वी के कारण सब लुभावनी सामग्री की मांग बढ़ने से प्रतिस्पर्धा होने से तनाव और आकांक्षा बढ़ने से घूसखोरी ,चोरी डकैती का प्रादुर्भाव बढ़ा. जाकी रही भावना जैसी .
विगत बीस वर्षों के लगभग मोबाइल ,कंप्यूटर,लैपटॉप जैसे संचार क्रांति का युग आया. बहुत चमत्कारी परिवर्तन समाज में हुआ. आज दूनिया मुठ्ठी में हैं हम विश्व को एक गांव के रूप में देखने लगे इससे बहुत अधिक फायदे हुए और हम एक दूसरे के बहुत करीब आये.और हमारे पास सूचना का भंडार आ गया पर ज्ञान शून्य हो गया ,बुद्धि का उपयोग अन्य दिशा में चला गया .इसने हमारी जीवन शैली में परिवर्तन लाया. पर हम बौद्धिक विकलांग हो गए और हमारा दृष्टिकोण एकांगी या एकाकी हो गया. इसके कारण अध्ययन ,अघ्यापन का तरीका बदल गया . गूगल हमारा ज्ञान का स्त्रोत बन गया. हम आजकल गणित जैसे विषयों को पढ़ते हैं करते नहीं हैं .आजकल लेखन शैली समाप्त होती जा रही हैं .हमें अपने दिम्माग पर अतिरिक्त बोझ नहीं देना . इससे ये फायदा हुआ की हम बिलकुल कूप मंडूक बन गए /हो गए. नेट/इंटेरनेट ने हमें इतना अधिक ज्ञानवान बना दिया की हमें समय के पूर्व अपने विषयों के अलावा अन्य विषय जो हमारे बौद्धिक विकास के लिए हानिकारक हैं उसको हमने ग्रहण कर लिया. इससे यह फायदा हुआ की जो इसका आदी हुआ उसके पास समय की कमी हो गयी. वह दिन रात ज्ञान की खोज में जुटा रहता हैं उसके मानसिक ,शारीरिक सेहत पर इतना अधिक प्रभाव पड़ गया है जिस कारण वह अधिकांश आपराधिक प्रवत्ति की और अग्रसर होता जा रहा हैं .
इस कारण उसमे मानसिक विकृति का जन्म होने लगा और पारिवारिक ,व्यक्तिगत ,सामाजिकता से दूर होता जा रहा हैं ,और अब मजेदार बात शुरू हो रही हैं की बच्चो को प्राथमिक स्तर से हम आधुनिक उपकरण से जोड़ रहे हैं जिससे उनका लिखना पढना तांत्रिक ( मैकेनिकल )होगा और वह खिलौना आगे चलकर कितना घातक होगा कहना कठिन हैं पर इस कारण अवसाद,तनाव ,मानसिक रुग्णता बढ़ेगी .जो किसी भी देश समाज परिवार व्यक्ति के लिए हानिकारक होगी.
मेरा प्रयास है हम कमसे काम आधुनिकता को अपनाये और अधिक से अधिक मौलिक परंपरा का पालन करे. बात कड़वी हो सकती हैं पर मेरे यथार्थ बोध के अनुसार आधुनिकता हमारे लिए अभिशाप न बन जाए .सोच में आधुनिकता आनी चाहिए. वर्तमान में बक्सर के कलेक्टर के द्वारा जो आत्महत्या की वह अपने आप में अत्यंत विचारणीय प्रश्न हैं की इतने संभ्रात ,सुशिक्षित ,और ज़िम्मेदार व्यक्ति अपने परिवार में सामंजस्य न बैठा सके तो इसका क्या इलाज हैं. पत्नी और माता पिता के बीच का सामंजस्य बैठाना कितना कठिन होता जा रहा हैं ,अब पत्नी का क्या होगा ?हो सकता हैं की गैर पसंदगी की शादी हुई होवे या प्रेम विवाह हुआ होगा .आजकल बहुएं पूरी स्वंत्रता चाहती हैं इसका अर्थ उन्हें अपने ससुराल की अपेक्षा अपना मायका अधिक पसंद हैं .अब पति न रहने से पूरा जीवन अकेले तो नहीं काटेंगी तो अन्य से शादी कर उसका जीवन बर्बाद करेंगी .यह क्रम कब तक चलेंगे.पांडेय के माता पिता ने कितने सपने संजोयें होंगे और वे सब ख़तम हो गए .ये सब तनाव के दुष्परिणाम हैं .
इसी प्रकार सिंघानिया को दर दर की ठोकर खाना पड़ रही हैं क्योकि उन्होंने अपनी जायदाद जीते जी अपने पुत्र को सौप दी .ये सब आधुनिकता का अभिशाप कह सकते हैं ,
चाणक्य ने कहा भी हैं — अपना धन पराये को देना ,वृद्धावस्था में स्त्री का मरना ,स्त्री का दुष्टा होना ,घर में नवजवान लड़की का विधवा अवस्था में रहना और भोजन की याचना करना जीते जी नरक के समान हैं .
जब तक हम एक दूसरे के भावों को आदर नहीं देंगे और जीवन में भी का उपयोग करेंगे तब हम सुखी जीवन व्यतीत कर सकते हैं .इसलिए तनाव आधुनिक युग का अभिशाप बनता जा रहा हैं
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद भोपाल 09425006753

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