उच्च शिक्षा ज्ञानवान बना सकती है, संस्कार वान नहीं

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जतारा,  बाल ब्रह्मचारिणी विशु दीदी के अनुशासन में संस्कारित हो रहे “विमर्श कैम्प के नन्हे मुन्ने बच्चों को देखकर समाज के बड़े बुजुर्ग भी यह बोल उठे – “काश मैं भी बच्चा होता।” जी हाँ, रविवार के दिन प्रातः काल की बेला में “विमर्श कैम्प के सभी बाल- गोपाल बच्चों ने आचार्य भगवन के चरणों में उपस्थित होकर, भक्ति-विनय- समर्पण के साथ शुरु पूजन का विहंगम दृश्य प्रस्तुत किया तो यहाँ उपस्थित आबाल-वृद्ध जन समुदाय के हृदय से यह वचन प्रस्फुटित हो उठे – “काश…! आज तो मैं भी बच्चा होता।” जन्मभूमि जतारा में चातुर्मास कर रहे “नगर गौरव आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज” के सानिध्य एवं निर्देशन में अनेकानेक धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हो रहे हैं। उस सभी अनुष्ठानों में ” विमर्श कैम्प ” अदभूत – अनुठा – बेजोड़ श्रेष्ठ अनुष्ठान है। गुरु पूजन के पश्चात् उपस्थित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में कहा-
वर्तमान में अविभावक माता-पिता अपनी संतान के लिए आज लौकिक शिक्षा का प्रबन्ध तो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ करने का प्रयास कर रहे है लेकिन संस्कार प्रबन्धन की ओर आज माता-पिता का किंचित भी ध्यान नहीं हैं। आज आपकी संतान संस्कारों से रहित होकर पशुओं की तरह जीवन निकाल रही है। आप उन्हें संस्कार नहीं दे पा रहे हैं, यही वर्तमान में सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक गृहस्थ को समय आने पर अपना उत्तर दायित्व अपनी योग्य संतान को सौंपना चाहिए । जब आपकी संतान संस्कारित ही नहीं होगी, तो आपके द्वारा संतान को सौंपा गया धन-वैभव शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाला है। संस्कार रहित मात्र लौकिक शिक्षा प्राप्त मानव तालाब में कीचड़ की भाँति मात्र दल दल ही पैदा कर सकता है कभी अनुशासित नदी की भाँति बह नहीं सकता । आज का मानव शिक्षित हो रहा है लेकिन बुद्धि से विहीन होता चला जा रहा है। बुद्धि उसे कहते हैं, जिससे हित-अहित का निर्णय किया जाए। आज का उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी बुद्धि से रहित होने के कारण खान-पान और वैचारिक प्रदूषण को प्राप्त होकर स्वयं के ही अहित में लगा हुआ है। वर्तमान में आप जो भी शिक्षा ज्ञान प्राप्त कर रहे है, उसका उपयोग बुद्धि को बढ़ाने में करना चाहिए अर्थात् उस प्राप्त हुई शिक्षा से स्वयं अपने हितरूप आचार- विचार को ग्रहण करके, अहित रूप आचार विचार को तिलांजलि दे देना चाहिए । तब ही हमारी शिक्षा व ज्ञान बुद्धि बनकर स्व-पर कल्याण कर सकता है। ध्यान रखना – संस्कार रहित शिक्षा, तटों से रहित बाढ ! के पानी की तरह मात्र विध्वंस का ही कार्य करेगी ।
सभा का संचालन जैन समाज उपाध्यक्ष अशोक कुमार जैन ने किया । धर्म सभा में महेंद्र टानगा, पवन मोदी, डॉ नीटू, इंजीनियर संतोष , मेहू, स्वप्निल, राजेश माते सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे ।

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