स्वयं को बदलने के बजाय हम दूसरों को बदलने में, स्वयं को धर्मात्मा और ज्ञानी मानने की भूल कर रहे हैं

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स्वयं को बदलने के बजाय हम दूसरों को बदलने में,
स्वयं को धर्मात्मा और ज्ञानी मानने की भूल कर रहे हैं..!   अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज  औरंगाबाद  उदगाव नरेंद्र /पियूष जैन भारत गौरव साधना महोदधि    सिंहनिष्कड़ित व्रत कर्ता अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज एवं सौम्यमूर्ति उपाध्याय 108 श्री पीयूष सागर जी महाराज ससंघ का महाराष्ट्र के ऊदगाव मे 2023 का ऐतिहासिक चौमासा   चल रहा है इस दौरान  भक्त को  प्रवचन  कहाँ की
स्वयं को बदलने के बजाय हम दूसरों को बदलने में,
स्वयं को धर्मात्मा और ज्ञानी मानने की भूल कर रहे हैं..!
आज के दौर में प्रवचन और सत्संग करने करवाने वालों की होड़ सी मची हुई है। अधिकांश कथाकार और प्रवचनकार ग्रन्थों के गूढ़ रहस्यों एवं अनुभवों से अनभिज्ञ है।यह सत्य है कि ग्रन्थों में जो लिखा है वो त्रिकालिक सत्य है, शाश्वत अमृत वचन है,, लेकिन उसकी गहराई को छूकर बोलने वाले या तदनुरूप आचरण करने वाले बहुत कम सन्त सन्यासी मिलेंगे। धर्म की व्यास पीठ पर बैठकर बोलने का अधिकार उसको ही है, जो ग्रन्थ के तदनुसार आचरण कर रहा हो।अन्यथा व्यास पीठ पर बैठकर प्रवचन, सत्संग करना, करवाना निरर्थक है। धर्म को जब तक स्वयं धारण नहीं करें, तब तक प्रवचन सत्संग करने करवाने का अधिकार नहीं है। क्योंकि धर्म को धारण करके कही गई बातें स्व-पर के कल्याण में कारण है, अन्यथा ऐसा ही है जैसे – मछली तो जल में रहे, तो भी वास ना जाये।
आज धर्म के अर्थ को समझने वाले कम और समझाने वाले बहुत ज्यादा लोग हो गये और जो समझ कर दुनिया को समझा रहे हैं वो भी योजनाओं में, धर्म की आड़ में मठो के मठाधीश बनकर बैठ गये हैं। सबको अपरिग्रह का उपदेश देकर, स्वयं जमीन-जायदाद के विस्तार में उलझ रहे हैं। ऐसे प्रवचनकार और कथाकार लोगों की श्रद्धा, भक्ति विश्वास का नायजाज फायदा उठाकर अपनी दुकान चला रहे हैं। धर्म के नाम पर लोगों को रट्टू तोते के समान धर्म, पन्थ, परम्परा और सम्प्रदाय का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो उनके जाने के बाद वही अधर्म की सड़ांध को फैलाते रहे। धर्म के फल से कुत्ता देवता बन जाता है और अधर्म के फल से, देवता भी कुत्ता बन जाता है…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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