शुभ भावों का सांसारिक जीवन में महत्त्व

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डॉ. नरेन्द्र जैन भारती सनावद
मनुष्य के जीवन में साधना और भावना का विशेष महत्त्व है। जिसकी जैसी भावना होती है वैसी उसकी साधना होती है। निमित्त भी वैसा ही मिलता है। संसार में जैसे ही मानव जन्मता है, उसी के साथ उसके मन में विभिन्न  विचार प्रकट होते हैं और नष्ट होते रहते हैं लेकिन जिसका मन जिस विचार पर केंद्रित हो जाता है वह विचार स्थायित्व की ओर आगे बढ़ जाता है। आत्मा तदनुसार  कार्य करने लगती है। शरीर को उस ओर लगाना मन का कार्य होता है। अतः आवश्यक है कि मन में ऐसे विचारों का आगमन हो जो मन को पवित्र बनाए रखे। पवित्र विचारों की साधना ही संस्कारों को जन्म देती है।
 संस्कारों के बीजारोपण के लिए धार्मिक वातावरण का मिलना जरूरी है। किसी भी जीव को शरीर मिलना स्वाभाविक है। नामकर्म के शुभोदय से सुंदर शरीर मिलता है और अशुभोदय से विकृत शरीर मिलता है। शरीर की सुंदरता तो बाह्य है लेकिन जिसके विचार,वाणी और व्यवहार मधुर होता है उससे व्यक्ति के मनोभावों की पहचान होती है। मन के विचारों से  संसारी आत्मा प्रभावित होती है अतः शरीर की साधना मन के विचारों पर निर्भर है लेकिन यह सत्य है कि साधना से ही संस्कार पडते हैं। निमित्त के मिलने पर मन वैसा कार्य करने लगता है। अतः शुभभावों का शांति की प्राप्ति में विशेष महत्व है भगवान महावीर स्वामी कहते हैं –
अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।
अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पटिठय सुप्पटिठओ।।
आत्मा ही सुख-दुख का कर्त्ता है और आत्मा ही भोक्ता है। सत्प्रवृत्ति में स्थित आत्मा अपना ही मित्र और दुष्प्रवृत्ति में स्थित आत्मा अपना ही शत्रु है। यहाँ भगवान महावीर स्वामी कहते हैं कि तुम ही कर्त्ता और तुम ही भोक्ता हो। तुम जो भी कर रहे हो वही तुम्हारे सुख दुख का कारण है। मन व्यक्ति को भाव बंध कराता है और आत्मा तदनुसार विभिन्न प्रवृत्तियों में बंधनबद्ध होकर संसार में भटकती रहती है। अतः मनुष्य की प्रवृतियां अच्छी हो इसलिए जीवन में धर्म का पालन जरूरी है। धर्म पुरुषार्थ हमें जगत में रहते हुए भी सद कार्यों के लिए प्रेरित करता है अतः मन को धर्म मार्ग पर चलाने के लिए संयम और तप की साधना जरूरी है। इन्हीं साधनाओं के लिए व्यक्ति सांसारिक जीवन की मोहमाया का त्याग कर मुनि बनकर शरीर से आत्म कल्याण के लिए साधना करता है। उनकी यह साधना उन के संस्कारों का साक्षात् दर्शन कराती हैं । हिंसा न करने के भाव यदि रहते हैं, असत्य से बचने के भाव बनते हैं, चोरी न करने का विचार रखते हैं, बृह्मचर्य का भाव मन में रहता है तथा संग्रहवृत्ति की अपेक्षा परोपकार के लिए दान देने की प्रवृत्ति बढ़ती है तो यह सब धार्मिक संस्कारों का ही प्रभाव है। अतः प्रत्येक परिवार के मुखिया का यह कर्त्तव्य होता है कि वह परिवार के सदस्यों को ऐसा वातावरण दे, ताकि उसकी प्रवृत्ति धर्म में लगी रहे। नैतिकता और सदाचार उसके जीवन के अंग रहे। मन में सदाचारों का वास होगा तो वह कालांतर में सुख शांति का कारण बनेगा। अतः धर्म की साधना के लिए नियमित धर्म करना चाहिए। अभिषेक,पूजा, पाठ, स्वाध्याय, ध्यान और दान के सभी कार्य धार्मिक प्रवृत्तियों में बने रहने के लिए आवश्यक होती है।
अतः मनुष्य को पुण्य कर्म कर जीवन को लक्ष्य प्राप्ति के लिए समर्पित करना चाहिए। सदा जीवन उच्च विचार के आदर्शों को उपस्थित कर जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए। ताकि आत्मा का कल्याण हो सके।

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