जैन धर्म में मकर संक्रांति का क्या महत्त्व है?

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श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ, गुन्सी (राज.) की पावन धरा पर विराजमान भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 विज्ञाश्री माताजी की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से 108 फीट उत्तुंग कलशाकार सहस्रकूट जिनालय का निर्माण होने जा रहा है। विविध प्रकार के आयोजन एवं योजनाओं से यात्रीगण जुड़कर धर्म का लाभ ले रहे है। चैत्यालय में विराजित 1008 श्री शांतिनाथ भगवान की मनोज्ञ प्रतिमा के दर्शन करने भक्तगण लालायित रहते है। अखिल भारतवर्ष में विज्ञातीर्थ क्षेत्र भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र बन चुका है।
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर आर्यिका श्री ने अपने मंगलमय उद्बोधन में श्रृदालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मकर संक्रांति का महत्व बताते हुए माताजी ने कहा कि – मकर एक राशि है। संक्रांति अर्थात संक्रमण। सूर्य जब कर्क राशि (दक्षिणायन) से कटकर संक्रमण होकर मकर राशि (उत्तरायण) में आता है। 1 लाख योजन विस्तार वाले जम्बूद्वीप में 2 सूर्यों का गमन क्षेत्र 184 गलियाँ है तथा एक सूर्य दो दिन में 1 परिधि को समाप्त करता है। जब सूर्य अभ्यन्तर वीथी (परिधि) में होता है, तब वह भरत क्षेत्र में स्थित लोगों को निषधगिरी के ऊपर उदित हुआ दिखाई पड़ता है। अयोध्या के मध्य में 84 मंजिल की महल के ऊपर स्थित भरत चक्रवर्ती ने सूर्य में स्थित जिनबिम्ब की परोक्ष में अभिषेक एवं अष्ट द्रव्य से पूजन की। यह उत्तरायण का प्रथम दिन 14 जनवरी को आने से हर वर्ष इसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग पूजा पाठ करने के साथ पतंग उड़ाने को लेकर खासा उत्‍साहित रहते हैं। बड़े हों या छोटे हर उम्र के लोग मांझा अपने हाथ में लेते हैं और आसमान तरह-तरह की रंग-बिरंगी पतंगों से सज जाता है। लेकिन कई बार पतंग उड़ाने के जोश में लापरवाह हो जाते हैं। जिससे राहगीर के अलावा पक्षियों को काफी नुकसान होता है।
सूर्य को जल का अर्घ देने की परंपरा कैसे चालू हुई ?
विशेष – ब्राह्मण वर्ण की स्थापना भरत चक्रवर्ती ने की थी । जो लोग अणुव्रतों का पालन एवं अपनी ब्रह्म (आत्मा) में रमण करते थे उन्हें भरत चक्रवर्ती ने ब्राह्मण संज्ञा दी थी ।
भरत चक्रवर्ती की आँखों की ज्योति इतनी अधिक थी की वह 47263/20 योजन की दूरी तक देख सकता था। इसलिए जब उन्होंने सूर्य बिम्ब में स्थित जिनप्रतिमा की परोक्ष रूप में अभिषेक एवं पूजन की तब ब्राह्मणों ने अपने अल्प ज्ञान से ऐसा समझ लिया कि अपने गुरु जब सूर्य जल और अर्घ्य चढ़ा सकते है तो क्यूँ न हम लोग उनकी इस परम्परा का अनुसरण करें । इस प्रकार इस परम्परा को चलते-चलते नया रूप बन गया। फलतः जैन धर्म के सिद्धान्तों को तो मरोड़कर ब्राह्मणों ने अपना अलग अस्तित्व बना लिया।
माताजी ने सभी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि – आपका जीवन पतंगों की तरह खुशियों से सराबोर हो और आप पतंग की तरह दिन दूनी , रात चौगुनी आसमान की ऊंचाइयों को छुये व साथ में सदैव प्रसन्नचित्त रहे। जिसे भी कही भी अगर पतंग की उलझी डोर नजर आये उसे आप समेट कर कूड़े दान में डालकर एक पुण्य के कार्य में सहभागी बनें। ऐसी डोर में अक्सर बेजान पंछी उलझ जाते हैं और जान गंवा देते है हमें खुशियां किसी को परेशान करके नहीं बल्कि खुशी देकर मनानी है ।

राजाबाबु गोधा जैन गजट संवाददाता राजस्थान

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