जगत के प्रपंचों से नहीं मिलती आत्म-शांति- आचार्य विशुद्ध सागर

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दिगम्बराचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि-
“सम्पूर्णजगत् के प्राणी सुख चाहते हैं, पर वह सुख, शांति जगत् के प्रपंचों में किंचित मात्र भी नहीं है।
आचार्य श्री ने ऋषभ सभागार, बड़ौत मे प्रवचन देते हुए कहा कि साता कर्म के उदय से व्यक्ति सुख प्राप्त करता है। पुण्योदय पर साधन, सम्पत्ति प्राप्त होती है, परन्तु साता नहीं है तो वही साधन कष्ट के कारण बन जायेंगे। भोगों में इन्द्रिय-सुख है, जो दुःखभूत है। काम-वासना का सुख, धन-धरती का सुख, भोग- उपभोग का सुख, सुख नहीं, सुखाभास हैं। शाश्वत सुख, परम शान्ति का कोई साधन है तो वह समीचीन जिन-धर्म है। धर्म ही उत्तम-सुख साधन है। सुख चाहिए तो धर्म करो। सुख चाहिए, तो इन्द्रिय-सुखों को छोड़कर, संयम-साधना कर, कर्म क्षय कर, आत्मिक-सुख प्राप्त करो। यथार्थ में श्रेष्ठ-सुख वही है, जो दुःख का कारण न बने। जिन भोगों का फल दुःख हो, वह सुख सुख नहीं।
जैसा बीज होगा, वैसा ही फल प्राप्त होगा। जैसे भाव होंगे, वैसा कर्म का बंध होगा। सही कर्म करो, कर्म से बचो। कर्म की गति विचित्र होती है। कर्म किसी को नहीं छोड़ते। जैसा भाव करोगे, वैसा कर्म का आसव- बंध होगा और जैसा कर्म बंध होगा वैसा कर्म उदय में आयेगा
कर्म ऐसे करो जिससे कष्ट न हो। जिंदगी ऐसे जियो जिससे दूसरों को दुःख न हो। जियो और जीने दो। भोग दुःखभूत हैं, संसार असार है, जीवन क्षण भंगुर है योवन क्षणिक समय थोड़ा है, विघ्न-बाधायें बहुत हैं, इसलिए इतना जान लो कि – सुख का उपाय क्या है? एक मात्र धर्म ही सार है। धर्म ही शांति का द्वार है। धर्म करो, परम-शांति प्राप्त करो।
संचलन डॉक्टर श्रेयांस जैन ने किया।दिगंबर जैन मन्दिर बड़ा गाव कमेटी ने आचार्य श्री को श्रीफल समर्पित किया।
सभा मे प्रवीण जैन, अतुल जैन, मनोज जैन, सुभाष जैन,प्रमोद जैन, आनंद जैन, विनोद जैन, अखिल जैन, सुखमाल जैन, जितेंद्र एडवोकेट, सचिन जैन भाजपा नेता, अशोक जैन, सुनील जैन, वरदान जैन, सौरभ जैन आदि उपस्थित थे।
अतुल जैन बुढ़पुर वाले मीडिया प्रभारी

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