चेन्नई। यहाँ अलवारपेट स्थित सीपी रामास्वामी अय्यर प्राच्यविद्या शोध संस्थान में 27 फरवरी, शुक्रवार को लाइफसेल इंटरनेशनल के चेयरमैन अभयकुमार श्रीश्रीमाल जैन ने बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के साझे में ‘दक्षिण भारत में जैन धर्म: इतिहास, कला और संस्कृति’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन उद्बोधन में श्रीश्रीमाल ने कहा कि तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के सभी राज्यों की कला, संस्कृति और साहित्य के संवर्धन में जैनों का ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत जैन पुरासंपदा का भंडार है। यहाँ उस कालखंड की दुर्लभ विरासत भी है, जब जैन धर्म संप्रदायों में विभक्त नहीं हुआ था।
सीपी रामास्वामी के योगदान को याद करते हुए श्रीश्रीमाल ने कहा कि जैनों ने समणपल्लियों के जरिए जन-जन में ज्ञान की चेतना जगाई। तमिल प्रदेश में समणपल्ली का इतना गहरा प्रभाव रहा कि आज भी तमिल में स्कूल को पल्ली ही कहा जाता है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में अति प्राचीन काल से ही जैन धर्म विद्यमान है। इस प्रदेश का कोई जिला ऐसा नहीं है, जहाँ कोई जैन अभिलेख उपलब्ध नहीं हो। इनमें ईस्वी पूर्व के शिलालेख भी हैं। ये अभिलेख तमिलनाडु के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन पर ऐतिहासिक प्रकाश डालते हैं।
तमिलनाडु अल्पसंख्यक आयोग में सदस्य राजेन्द्र प्रसाद जैन ने तिरुकुरल के प्रथम पद का उच्चारण करके प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का स्मरण किया और अहिंसा वॉक तथा मदुरै में बनने वाले जैन विरासत केन्द्र की जानकारी दी। पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का कथन उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि तमिल साहित्य में जैनों का सर्वाधिक योगदान है। इस पर बेंगलुरु की इतिहासकार प्रो. चूडामणि नंदगोपाल ने कहा कि कन्नड़ साहित्य के विकास में भी जैनों का सर्वाधिक योगदान है। संस्थान निदेशक डॉ. नंदिता कृष्णा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि बलिप्रथा की खिलाफत और शाकाहार की प्रतिष्ठा में भगवान महावीर का उपकार कभी नहीं भुलाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म के संस्थापक भगवान ऋषभदेव और अन्य कुछ तीर्थंकरों का वेदों में भी उल्लेख हैं।
संगोष्ठी में शसुन जैन कॉलेज द्वारा निर्मित हिंदी लघुफिल्म ‘अनमोल विरासत (तमिलनाडु में जैन धर्म)’ दिखाई गई। इस फिल्म में साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने कॉलेज के जैनविद्या विभाग के शोध-प्रमुख के रूप में कारगर भूमिका का निर्वहन किया था। संगोष्ठी समन्वयक डॉ. जी. बालाजी ने मुख्य अतिथि श्रीश्रीमाल की उपलब्धियाँ बताई। संस्थान की ओर से अतिथियों का सम्मान किया गया। शुरू में श्रीनिवासन ने तमिल में और शसुन जैन कॉलेज की छात्राओं ने प्राकृत में मंगलाचरण किया। तकनीकी सत्र में मेघ कल्याणसुंदरम ने बताया कि तीर्थंकर महावीर ने बुद्ध से काफी पहले अपने तीर्थ की स्थापना कर ली थी। डॉ. ई. शिवनागी रेड्डी ने तेलंगाना में जैन विरासत, केवी रामकृष्ण राव ने पश्चिमी तट से जैनों द्वारा समुद्री व्यापार, एस. अनुराधा ने दक्षिण भारतीय राजवंशों पर जैन धर्म का प्रभाव पर शोधपत्र पढ़े। कार्यक्रम में कवि डॉ. दिलीप धींग, डॉ. सीके शिवप्रकाशम, डॉ. प्रियदर्शना जैन, डॉ. अजितदास तथा दक्षिण भारत के सभी राज्यों से आए विद्वान, विद्यार्थी, शोधार्थी और समाजजन उपस्थित थे।
संलग्न फोटो – उद्घाटन उद्बोधन देते मुख्यअतिथि अभयकुमार श्रीश्रीमाल
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