चित्त को चित्त में रखो तभी परमेष्ठी की प्राप्ति होगी :आचार्य प्रमुख सागर

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गुवाहाटी : फैंसी बाजार स्थित भगवान महावीर धर्म स्थल में विराजित आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ने आज (मंगलवार) को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि पंचमकाल में मुनि मुद्रा को बिरले ही स्वीकार करते हैं। वैसे श्रावक भी बिरले ही होते है। इस काल में सवा सौ करोड़ की आबादी मे मात्र पंद्रह सौ मुनिराज है, क्योंकि बिरले जीव ही भगवान महावीर स्वामी की दिगंबर मुद्रा को धारण कर पाते हैं। सवा सौ करोड़ में मात्र दो करोड़ जैन है। उसमें भी देड़ करोड़ जैनों को मुनि सानिध्य भी प्राप्त नहीं हो पाता है। वे दिगंबर मुनिराज का सत्कार भी नहीं कर पाते हैं।जैनो की पहचान तो दिगंबर जैन प्रतिमा एवं दिगंबर मुनिराज है, अन्य व्यक्ति वस्त्र धाड़ कर अपने आप को परमेष्ठी माने गुरु सतगुरु कहे और जैन धर्माबलम्बी उसे स्वीकारते हैं तो अपने ही दिगंबर धर्म का नुकसान करते हैं। आचार्य श्री ने कहा की चित्त को चित्त में रखो तभी परमेष्ठी की प्राप्ति होगी। इससे पूर्व आज प्रात: आचार्य श्री ससंघ के मुखारविंद से श्रीजी की शांतिधारा करने का परम सौभाग्य ज्ञानचंद-अमिता देवी सेठी, सुरेश कुमार-अनु देवी पांण्डया परिवार गुवाहाटी एवं आशीष कुमार- मनीष कुमार जैन परिवार बहादुरगढ़ हरियाणा को प्राप्त हुआ। यह जानकारी समाज के प्रचार-प्रसार विभाग के मुख्य संयोजक ओम प्रकाश सेठी एवं सुनील कुमार सेठी द्वारा दी गई।

सुनील कुमार सेठी
प्रचार प्रसार विभाग, श्री दिगंबर जैन पंचायत, गुवाहाटी असम

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