भारतीय पत्रकारिता विश्व में सबसे अधिक अविश्वनीय क्या यह हमारे लिए शर्मनाक नहीं हैं

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खेचो न कमानों को ,न तलवार निकालो ,
जब तोप मुकाबिल हो तो, अखबार निकालों
अभी जब कांग्रेस पार्टी ने १४ टीवी एंकर का बहिष्कार किया उसमे कुछ लोग तमतमाए और पार्टी को भला बुरा कहा। बिना कारण के कार्य नहीं होता। इस पर आत्मचिंतन की जरुरत हैं।
ये पंक्तियों को समझने वाले कहाँ बचे आज .एक संस्था के द्वारा यह दावा किया हैं की भारत का दूसरा स्तम्भ सबसे अविश्वनीय ,बिकाऊ हैं क्या यह शर्मनाक स्थिति नहीं ? हम पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टि डालेंगे तब हम देखेंगे की वर्ष १८१६ में राजा राम मोहन राय ने प्रेरित होकर बंगाल गजट की शुरुआत की गयी. उन्होंने अपनी दबंग आवाज से सती प्रथा की बात कितनी वजनदारी से की थी “जब बेचारी कोमलांगी ,चिता की हाहाकारी लपटों को न सह सकने के कारण किसी प्रकार भाग कर अपना प्राण बचाने का प्रयत्न करती तब धरम के ठेकेदार बड़ी बड़ी लोहे की सलाखों से छेद छेद कर मरने के लिए विवश करते . जलती हुई अबलाएं भीषण आर्तनाद से कलेजा कंपा देती पर ये नराधम घंटे घड़ियाल और अन्यान्य वाद्य इस जोर से बजाते कि उनका चीत्कार उन बांजों कि झंकार में विलीन हो जाता .”
इस क्रम में राजा राम मोहन राय ,मौलवी मोहम्मद बाकर ,युगल किशोर शुक्ल ,राजा शिव प्रसाद “सितारे हिन्द” बालकृष्ण भट्ट ,भारतेन्दु हरिश्चंद्र ,बाल गंगाधर तिलक ,प्रताप नारायण मिश्र ,विपिनचन्द्र पाल . दुर्गाप्रसाद मिश्र , एस .कस्तूरीरंगा अय्यंगार ,मदनमोहन मालवीय , अमरतलाल चक्रवर्ती ,महावीर प्रसाद द्विवेदी ,जी परमेश्वरन पिल्लै ,लाला लाजपत राय .रामानंद चटर्जी , मोहन दास करमचंद गाँधी ,सच्चिनान्द सिन्हा ,माधवराव सप्रे से लेकर बनारसीदास चतुर्वेदी ,तुषारकान्ति घोष , स्वामीनाथ सदानंद , द्वारका प्रसाद मिश्र और के .पी ,नारायण इत्यादि जिन्होंने अपना बलिदान दिया कितना संघर्ष किया वह अक्लपनीय और अकथनीय हैं .उन् दिनों हिंदी पत्रकारिता कि नीव संघर्ष ,त्याग ,बलिदान और निर्भीकता पर रखी गयी थी. उस समय आर्थिक हानि सहकर पत्रकारिता और साहित्य सेवा की गयी.
डंका कूच का बज रहा मुसाफिर जागो रे भाई ,
देखो लाद चले पंथी सब तुम क्यों रहे भुलाई ,
अब चलना ही निहचै है तो लेकिन माल लदाई,
हरिचंद हरिपद बिनु नहिं तो रहि जैहों मुंह बाई .
कभी कभी ऐसी तुकबंदी कि गयी ===
आती है बाग़ से कुछ बू -ए-कबाब
किसी बुलबुल का दिल जला होगा .
तिलक अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे. इसे वे मनुष्य का मौलिक अधिकार जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे.उनकी पत्नी के मृत्यु के समय तिलक माण्डले जेल में थे .उन्होंने धैर्य पूर्वक जो उत्तर दिया वह मार्मिक हैं —–तार मिला भरी आधात लगा ,मैं संकटों कि शांतिपूर्वक सहन कर लेता किन्तु इस समाचार ने भूकंप के समान झकझोर दिया ,मुझे दुःख इस बात हैं कि उसके अंतिम क्षणों में उसके पास न था. बच्चों से कहा इस विपत्ति से स्वाबलंबन का पाठ सीखे ..एक बार तिलक जी ने कहा –” आज तुम्हारे हाथ में सुयोग हैं इसे छोड़कर तुम आने वाली पीढ़ियों का अभिशाप अपने ऊपर मत लो .तुम्हारी अकर्मण्यता पर भावी संतानें तुम्हे कोसेंगी .साहस से काम लो .चूको मत ,लोहा गर्म हैं अभी चोट करो .
श्री प्रताप नारायण मिश्र ने अपनी वेदना इस प्रकाय रखी ==
दरो-दीवार पै हसरत से नज़र करते हैं ,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं
विपिनचन्द्र पाल कहते हैं ” राष्ट्र एक जीवंत इकाई है जो राष्ट्रीयता को समाहित किये होती हैं .इसी राष्ट्रीयता के गुण व्यक्ति विशेष में होती हैं .अतः हमारी शिक्षा के माधयम से नवयुवकों में राष्ट्रीयता कि भावना संचार किया जाना चाहिए .
दुर्गा प्रसाद मिश्र के द्वारा लिखा गया दोहा हमारीस्वाभाव को उद्वेलित करता हैं
सगुन खनिज विचित्र अति खोले सबके चित्र .
शोधै नर चरित्र यह भारत मित्र पवित्र .
अमृतलाल चक्रवर्ती के बारे में श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बहुत ज्वलंत बात लिखी — वे साहित्य में उगते हुए पौधों को विकसित होने देना चाहते थे वे कहते थे कि कौन जाने कोई लेखक कब कितना प्रतिभाशाली निकल जाए .इसलिए उसके विकास में रोड़े नहीं डालना चाहिए .
आज के पत्रकारों के लिए बहुत बहुमूल्य सलाह उनके द्वारा दी गयी जो अनुकरणीय हैं ” पत्रिकाओं का जीवन निर्भीक और आग से तपा हुआ होना चाहिए. हर एक का अपना अपना लक्ष्य होता हैं .उनका वेतन अवश्य कम होता था .सौ रुपये मासिक वेतन मिलना बड़ी बात समझी जाती थी . तब आज जैसी मंहगाई नहीं थी .रुपये कि क्रय शक्ति काफी अधिक थी . जो धनि वर्ग पत्रों का सञ्चालन करता था ,वह पत्रकारों के आगे हाथ जोड़े खड़ा रहता था .संचालक ही अक्सर पत्रकारों के घरों को जाते थे और यदि देवयोग से पत्रकार धनियों कि कोठियों पर जाते तो वे अपनी गद्दियां छोड़कर द्वार पर खड़े हो जाते थे और अभ्यर्थना करते. उन्हें गद्दी पर तकिये के सहारे बिठाते .धनि वर्ग सोचता कि यदिसंपादक कदाचित नाराज़ हो गए ,तो उनके महलों के कांच टूट जायेंगे ,पत्र संपादन कि निति निर्धारण में संचालकों का कोई हस्तक्षेप न होता था. संपादक कि नीति पत्र कि नीति होती थी .
इतनी निर्भीकता से लिखने वालों का हश्र क्या होता हैं जरा इसे जरूर देखे — अंत समय उनका शरीर असाध्य हो गया . वे उठ बैठ नहीं सकते थे .पैर फूल गए थे ,उन्हें शरीर कि चिंता के साथ अपने आश्रितों कि चिंता थी .घर में कमाने वाला कोई नहीं उनकी पत्नी थी और विधवा पुत्रियां .पास में एक पैसा नहीं था . घर के लोगों को उपवास करते देखकर वे रो पड़ते थे .संसार के किसी भी देश में साहित्य के लिए जीवन देने वाले व्यक्ति कि ऐसी अवस्था न हुई होंगी .उन्होंने अपने मित्र को लिखा “यदि कल तक सहायता न मिली ,तो मेरे जीवन कान्त हो जाएगा,मुझसे घर का दुःख देखा नहीं जाता . इस समय मेरे पास दो आने पैसे भी नही हैं ,जो एफएम मांगकर अपना जीवन समाप्त कर दू . मेरे पास अफीम का तेल रखा हैं ,जीवन समाप्त करने का वही साधन हैं .अंत समय अपना चीता विचलित न करते हुए कहते हैं ” दुःख और मृत्यु का क्या भय हैं ,मेरी चिंता तो इन आश्रितों के लिए हैं .इन यातनाओं और दुःख में मुझे भगवान् के दर्शन हो रहे हैं ”
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने चार आदर्श और सिद्धांत नियत किये थे .–१ वक्त कि पाबंदी २ रिश्वत न लेना ३ अपना काम ईमानदारी से करना ४ ज्ञान वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना और मालिकों का विश्वास पात्र बनने कि चेष्टा ,अपने लाभ हानि कि परवाह न करके पाठकों के लाभ हानि का सदा ख्याल रखना और न्याय पथ से कभी विचलित न होना .
पत्रकारिता म ऐसे हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं पर वर्तमान में पत्रकार वह हैं जिसके पास कार नहीं वह पत्रकार नहीं ,आज पत्रकार पूंजीपतियों से कम नहीं और चाटुकारिता के कारण वे आगे बढ़ रहे हैं .आज बुनियादी शिक्षा का पूर्ण आभाव हैं पत्रकारों में ,कोई भी पत्रकार पीत पत्रकारिता में अग्रसर होकर अपने को स्थापित करता हैं .निष्ठाएं समाप्त हो गयी चंद चांदी के टुकड़ों के लिए मीडिया कर्मी एक संस्था से दूसरे में चले जाते हैं जैसे कोई नेता कांग्रेस में रहकर भारतीय जनता पार्टी कि आलोचना करते हैं और फिर उस पार्टी में चले जाकर उस पार्टी के गुणगान करते हैं .जहाँ अवसर मिला जहाँ स्वार्थ पूर्ती कि संभावना होती हैं वह फ़ौरन चले जाते हैं उनका तर्क वह पैकेज ,सुविधा अधिक हैं ,उसका मालिक ,प्रबंधन मनोकूल हैं और फिर वह दूसरे चैनल कि बुराई करता हैं .
आज पैसों के पीछे न्यूज़ बदल जाती हैं और न मिलने पर उसको उजागर कर दिया जाता हैं . सर्वे ने जो बात उजागर की वह सौ प्रतिशत सत्य हैं और उसके लिए कोई प्रमाण कि जरुरत नहीं हैं .कल जो ज़ी में था वह आजतक में आ गए और किसी किस्से ने इतना विकास किया कि वे खुद मालिक बन गए .
वर्षा के जल से कभी भी नदियों में बाढ़ नहीं आती जब तक उनमे नाले नालियों का पानी न मिले . सब पत्रकार अपने कर्तव्यों निष्ठाओं के बेचकर स्वयं स्थापित कर रहे हैं और अपने आश्रितों को नेताओं जैसे कई पीढ़ियों तक के लिए सुरक्षित कर रहे हैं . इसलिए अब उनके मुँह से चरित्र ,इंसानियत ,शुचिता भ्र्ष्टाचार ,नैतिकता की बात करना बेमानी लगता हैं इसमें अब शायद सुधार की संभावना नहीं दिखाई दे रहीं हैं और कही हम पहले पायदान पर न आजाये .स्वयं आत्म चिंतन मंथन की जरुरत हैं कारण अब हमाम में सब नंगे हो चुके .
विद्यावाचस्पति डॉक्टरअरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल ९४२५००६७५३

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