भारत रत्न मदर टेरेसा जन्म –जयंती

0
110

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे। मदर टेरेसा का वास्तविक नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।
उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। वह एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। पढाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। वह और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिका थीं। ऐसा माना जाता है की जब वह मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी और 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया।
१९७० तक वे गरीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसे समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गॉड में इसका उल्लेख किया गया। इन्हें १९७९ में नोबेल शांति पुरस्कार और १९८० में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह १२३ देशों में ६१० मिशन नियंत्रित कर रही थीं। इसमें एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे और साथ ही सूप, रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे।
1928 में केवल 18 साल की उम्र में उन्होंने लोरेटो बहनों के साथ रहने के लिये घर छोड़ दिया था, वही मदर टेरेसा इंग्लिश भी सीखती थी और ईसाई धर्म प्रचारक बनने की राह में चल पड़ी। लोरेटो बहाने भारत में बच्चो को पढ़ाने के लिये इंग्लिश भाषा का उपयोग करते थे। घर से निकालने के बाद उन्होंने दोबारा कभी अपनी बहनों और अपनी माँ को नही देखा था। 1934 तक उनका परिवार स्कोप्जे में ही रहता था और इसके बाद वे अल्बानिया के टिराना में चले गए थे।
इसके बाद सन 1929 में मदर टेरेसा भारत आई और दार्जिलिंग में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की, वही हिमालय की पहाडियों के पास सेंट टेरेसा स्कूल में वे बंगाली सीखी और वहाँ बच्चो को पढ़ाती थी 24 मई 1931 को उन्हें पहली बार सन्यासिनी की पदवी मिली थी। और इसके बाद उन्होंने अपना मूल नाम बदलकर टेरेसा ही रखा।
मदर टेरेसा एक रोमन कैथोलिक सन्यासिनी थी, जिन्होंने अपने जीवन को गरीबो और जरुरतमंदो की सहायता करने में ही व्यतीत किया। उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर समय काल्चुता में ही बिताया, जहाँ उन्होंने कई समाजसेवी संस्थाओ की स्थापना भी की। 1979 में ही टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और तभी से वह काफी लोकप्रिय बन गयी।
उनका भगवान में बहुत भरोसा था। उनके पास बहुत पैसा या संपत्ति नहीं थी लेकिन उनके पास एकाग्रता, विश्वास, भरोसा और ऊर्जा थी जो खुशी से उन्हें गरीब लोगों की मदद करने में सहायता करती थी। निर्धन लोगों की देख-भाल के लिये सड़कों पर लंबी दूरी वो नंगे पैर चलकर तय करती थी। लगातार कार्य और कड़ी मेहनत ने उनको थका दिया था फिर भी वो कभी हार नहीं मानी।
भारत आकर उन्होंने दीन-दुखियों और सामाजिक तिरस्कार से जूझते हुए लोगों को एक मां का सच्चा प्यार दिया । कोढ़ी, अपाहिज, वृद्ध और गरीब बच्चों के लिए मदर टेरेसा ईश्वर का प्रतिरूप बनी । जिन कोढ़ियों के शरीर से मवाद रिसता था, घावों पर मक्खियां भिनभिनाती थी, जो नित प्रति मृत्यु की अभिलाषा में जीवित थे, जिन्हें समाज ने तिरस्कृत किया, उनके समीप से गुजरना भी उगम उगदमी के लिए दुष्कर था, परंतु मदर टेरेसा साधारण संसारी नहीं थीं । उन्होंने उन कोढ़ियों को न सिर्फ छुआ, बल्कि उनकी सेवा-सुश्रुषा भी की।
बड़े ही तन्मय भाव से, जिस प्रकार ईश्वर की भक्ति में लीन भक्त । मदर टेरेसा दीन-दुखियों की भक्त थीं, उन्हें उनके शरीर से पूणा नहीं होती थी । उनके हृदय में दया उगैर प्रेम का ऐसा सागर उमड़ता था कि रोगी स्वयं को निरोगी समझने लगते थे । मदर टेरेसा का एक ही धर्म था, मानव सेवा । सर्वधर्म, समभाव की भावना को वे दीनहित में समाहित रखती थीं । उनके सेवा-उद्देश्य वाले जीवन में सैकड़ों बाधाएं उत्पन्न हुई, परंतु उन्होंने डटकर इन बाधाओं का मुकाबला किया । हर अच्छे कार्य के आरम्भ में बाधाएं आनी स्वाभाविक हैं । बाधाएं ही उद्देश्य की तरफ अग्रसर होने का साहस देती हैं । मदर टेरेसा ने ऐसी अनेक बाधाओं को अपनी दृढ़ता, सेवा और स्नेह से पराजित किया ।
सेवा :
मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि ‘प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बडी है।’ उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें – भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।
पुरस्कार :
मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिये विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से विभूषित किय गया है। १९३१ में उन्हें पोपजान तेइसवें का शांति पुरस्कार और धर्म की प्रगति के टेम्पेलटन फाउण्डेशन पुरस्कार प्रदान किय गया। विश्व भारती विध्यालय ने उन्हें देशिकोत्तम पदवी दी जो कि उसकी ओर से दी जाने वाली सर्वोच्च पदवी है। अमेरिका के कैथोलिक विश्वविद्यालय ने उन्हे डोक्टोरेट की उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार द्वारा १९६२ में उन्हें ‘पद्म श्री’ की उपाधि मिली। १९८८ में ब्रिटेन द्वारा ‘आईर ओफ द ब्रिटिश इम्पायर’ की उपाधि प्रदान की गयी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की उपाधि से विभूषित किया। १९ दिसम्बर १९७९ को मदर टेरेसा को मानव-कल्याण कार्यों के हेतु नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया।
मृत्यु :
बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थीं। इसके पश्चात वर्ष 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया। साल 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। इसके बाद उनकी सेहत लगातार गिरती रही। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।
धन्य हैं ऐसी सेवा की प्रतिमूर्ति
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन, संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here