उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म —–विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

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वर्तमान में बलात्कार ,अवैध प्रेम ,लव जिहाद ,काम वासना के वशीभूत घर से भागना ,हत्याएं और आत्महत्याएँ बहुत समय घटनाएं होती हैं उनके पीछे काम वासना हैं ,इसकी पूर्ती के लिए पुरुष– स्त्रियां  क्या क्या नहीं करते हैं .एक क्षण की भूल जिंदगी भर के लिए गुनहगार बना देती हैं .आज देश में आबादी संकट के नियन्तण में ब्रह्मचर्य व्रत का बहुत बड़ा योगदान होगा .जितनी अधिक लम्पटता हमें सिनेमा ,टेलीविज़न के साथ मोबाइल इंटरनेट के कारण ये विकार बहुत अधिक प्रचलन में हैं ,इनसे बचाव मात्र ब्रह्मचर्य अणुव्रत का पालन से हो सकता हैं .
यदि पैसा की कमी कोई कमी नहीं ,स्वास्थ्य की कमी कुछ गया और यदि चारित्र गया सब कुछ गया। चरित्र का स्थान सर्वप्रथम हैं।
कामसेवन का मन से, वचन से तथा शरीर से परित्याग करके अपने आत्मा में रमना ब्रह्मचर्य है।
संसार में समस्त वासनाओं में तीव्र और दुद्र्वर्ष कामवासना है। इसी कारण अन्य इन्द्रियों का दमन करना तो बहुत सरल है किन्तु कामवासना की साधन भूत काम इन्द्रिय का वश में करना बहुत कठिन है। छोटे-छोटे जीव जन्तुओं से लेकर बड़े से बड़े जीव तक में विषयवासना स्वाभाविक (वैभाविक) रूप से पाई गई है। सिद्धांत ग्रन्थों ने भी मैथुन स्ंज्ञा एकेन्द्रिय जीवों में भी प्रतिपादन की है।
कामातुर जीव का मन अपने वश में नहीं रहता। उसकी विवेकशक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। पशु तो कामवासना के शिकार होकर माता, बहिन, पुत्री, स्त्री आदि का भेदभाव करते ही नहीं। सभी को समान समझ कर सबसे अपनी कामवासना तृप्त करते रहते हैं। इसी कारण उन्हें पशु (समान पश्यति इति पशु) कहते हैं। परंतु कामातुर मनुष्य भी कभी कभी पशु सा बन जाता है। कवि ने कहा है-
दिवा पश्यति नीलूको मनुजो रात्रि न पश्यति।
अपूर्वः कोपि कामान्धो दिवारात्रं न पश्यति।।
अर्थात्- दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता और मनुष्य को रात में नहीं दिखाई देता। परंतु कामान्ध पुरुष न रात में कुछ देखता है न दिन में। उसके नेत्र कामवासना के कर्तव्य अकर्तव्य को कुछ नहीं देख पाते।
कभी-कभी संसार सम्पर्क से दूर रहने वाले इन्द्रिय विजेता ऋषि लोग भी कामवासना के शिकार होकर अपनी तपस्या नष्ट कर डालते हैं। इस कारण कामदेव पर विजय प्राप्त करके ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना बहुत कठिन है। अतः कामवासना को जीतने वाला व्यक्ति संसार में सबसे अधिक पूज्य और बलवान् माना जाता है।
बहुत से कामी पुरुष अपनी कामवासना शांत करने के लिये स्त्रियों पर बलात्कार (स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक मैथुन करना) किया करते हैं।
शरीर में और दिमाग में जो मूल शक्ति है वह वीर्य के कारण ही प्राप्त होती है। जो मनुष्य मैथुन द्वारा वीर्य पतन करते हैं उनके शरीर और दिमाग की शक्ति क्षीण हो जाती है। और वे बलहीन होकर अनेक रोगों के शिकार बन जाते हैं, ऐसे बलहीन मनुष्य ही राजयक्ष्माक्षयरोग (तपेदीक टी0वी0) के भी पँजे में फँस जाते हैं और अकाल में मृत्यु के ग्रस्त बन जाते हैं।
इस कारण बलवान स्वस्थ दीर्घजीवन प्राप्त करने के लिये मनुष्य को अपने वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। उसको व्यर्थ नष्ट न करना चाहिए। क्योंकि वीर्य शरीर का राजा हैं। जैसे कि राजा के बलवान रहते हुए प्रजा को कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं पहुँचा सकता, इसी तरह वीर्य के बलवान रहने पर शरीर को कोई भी रोग कष्ट नहीं पहुँचा सकता।
जिस व्यक्ति में आत्मबल की कमी होती हैं, उसी में विषयवासना अधिक होती है। सिंह केवल एक बार विषय सेवन करता है, सिंहनी को उसी से गर्भाधान हो जाता है। तदनन्तर साथ-साथ रहते, सोते उठते बैठते भी फिर सिंह सिंहनी पर नहीं चढ़ता।
देव-देवियों का शारीरिक मैथुन पहले दूसरे स्वर्ग में ही है। तदनन्तर क्रमशः स्पर्श, दर्शन (देखना), वार्तालाप तथा मानसिक मैथुन होता है। सोलहवें स्वर्ग से ऊपर समस्त देव आजन्म ब्रह्मचारी होत हैं।
इस प्राकृतिक व्यवस्था में दो सिद्धांत निश्चित होते हैं। (१) निम्न श्रेणी के जीवों में विषय-वासना तीव्र होती है, उच्च श्रेणी के जीवों में कामवासना कम होती जाती है। (२) ब्रह्मचर्य आत्मा को अधिक आनंददायक है, काम सेवन में ब्रह्मचर्य की अपेक्षा आनंद बहुत कम है। क्योंकि संसार में सबसे अधिक सुख सर्वार्थसिद्धि के देवों को होता है जो कि ब्रह्मचारी होते हैं।
विवाह हो जाने पर भी स्त्री पुरुषों को स्वस्थ सुखी प्रसन्न जीवन बिताने के लिए कम से कम काम सेवन करना चाहिये।यदि हमको अपनी विधवा बहिन या पुत्री आदि का सदाचार सुरक्षित रखना हो तो हमको अपना चारित्र पवित्र बनाना होगा।
बच्चों को सच्चरित्र बनाने के लिये दूध मुँहे बच्चे के सामने भी मैथुन सेवन न करना चाहिये। छोटे बच्चे कुछ कह नहीं सकते, किन्तु अपनी माता तथा पिता की प्रत्येक बात उनके कोमल हृदय पर अंकित होती जाती है। वे ही संस्कार बड़े होने पर बच्चों को सदाचारी या दुराचारी बना देते हैं।
अष्टमी, चतुर्दशी, अष्टाह्रिका, दशालाक्षणी, आदि धार्मिक दिनों में स्त्री पुरुषों को पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये।
ब्रह्मचारी  सदा शुचि:-आत्मा में पवित्रता ब्रह्मचर्य गुर्ण के कारण आती है। दुराचारी, व्यभिचारी सदा अशुद्ध अपवित्र रहता है।
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य अणुव्रत का ठीक आचरण नहीं करते यानी अन्य स्त्रियों, वेश्याओं कुमारी कन्याओं आदि के साथ व्यभिचार सेवन करते हैं उनके घर में दुराचार प्रवेश हो जाता है। फिर उनके घर में उनकी स्त्री, पुत्र आदि सभी दुराचारी बन जाते हैं। क्योंकि दुराचार की छाया में सदाचार कभी नहीं पनप सकता। इस कारण जो मनुष्य अपनी स्त्री, पुत्री, बहिन, पुत्र आदि को सदाचारी बनाना चाहता है उसे पहले स्वयं सदाचारी बनाना चाहिये।
ब्रह्मचारी का आत्मा में महान् बल का विकास होता है, उसके मुख पर तेज चमकता है, उसकी वाणी में प्रभाव होता है, उसका शरीर बलिष्ठ और निरोग होता है, उसकी बुद्धि विकसित हो जाती है। अनेक आध्यात्मिक गुण प्रकट होने लगते हैं।
इस कारण अनैतिक कामसेवन को रोककर, नैतिक मैथुन को भी बहुत कम कर देना चाहिए और ब्रह्मचर्य का अधिक से अधिक पालन करना चाहिये।
ये क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वभाव रूप हैं अतः ये आत्मा के धर्म हैं।इसलिए हमारे जीवन में ब्रह्मचर्य धर्म का बहुत महत्व हैं ,वैसे भी कहा गया हैं
यदि पैसा की कमी कोई कमी नहीं ,स्वास्थ्य की कमी कुछ गया और यदि चारित्र गया सब कुछ गया। चरित्र का स्थान सर्वप्रथम हैं।
शील -बाढ़ नौ राख ,ब्रह्म-भाव अंतर लखो।
करि दोनों अभिलाख ,करहु सफल नरभव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ ,माता बहिन सुता पहिचानो।
सहें वान -वरषा बहु सूरे ,टिके न नैन -बाण लखि कुरे।।
कुरे तिया के अशुचि तन में ,काम -रोगी रति करैं ।
बहु मृतक सडहिं मसान माहीं ,काग ज्यों चोंचें भरें।।
संसार में विषयाभिलाषा ,तजि गए जोगीश्वरा।
ज्ञानत धर्म देश पैड़ी चढ़के। शिव -महल में पग धरा।।
ॐ ह्रीं उत्तम  ब्रह्मचर्य धर्मांगाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा.
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन   संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल  ०९४२५००६७५३

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