तिरुमलै में डॉ. दिलीप धींग का सम्मान

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चेन्नई।
शसुन जैन कॉलेज में जैनविद्या विभाग के शोध-प्रमुख साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने 9 जून को तिरुवन्नामलै जिलांतर्गत प्रसिद्ध जैन तीर्थ तिरुमलै स्थित अरिहंतगिरि में कहा कि हर जिनालय के साथ विद्यालय और चिकित्सालय होना चाहिये। आचार्य सुविधिसागर, आचार्य गुलाबभूषण, भट्टारक धवलकीर्ति और गणिनी आर्यिका सुविधिमति की सन्निधि में डॉ. धींग ने कहा कि जैन दर्शन में आत्म साधना के साथ परोपकार की आगमिक व ऐतिहासिक परंपरा रही है। दक्षिण भारत में समण पल्लियां उसी का एक रूप थीं। जैन समाज में आज भी धर्म-ध्यान के साथ सेवा और शिक्षा के प्रचुर कार्य हो रहे हैं। सुविधिसागर और डॉ. धींग के बीच शास्त्रीय साहित्यिक चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि धवलकीर्ति दूरदर्शी भट्टारक हैं। 1998 में उन्हें श्रवणबेलगोला के भट्टारक चारुकीर्ति ने पट्टासीन किया था। अस्सी जिनालय उनकी देखरेख में हैं। अनेक स्थानों पर विद्यालय, मानवसेवा, गोसेवा, जीवदया के कार्य हो रहे हैं। इस अवसर पर भट्टारक धवलकीर्ति ने डॉ. दिलीप धींग का सम्मान किया। उन्होंने कहा कि इस धरा पर आचार्य अकलंक ने साहित्य साधना की थी। आचार्यश्री और भट्टारकजी ने शसुन जैन कॉलेज की सचिव उषा-अभय श्रीश्रीमाल एवं समाजसेवी सरिता एमके जैन के योगदान को सराहा। आचार्य अकलंक विद्यापीठ के विद्यार्थियों ने अभिषेक में भाग लिया। राजकुमार जैन ने धन्यवाद दिया।
– डॉ. ज्ञान जैन
निदेशक: जैन विद्या विभाग, शसुन जैन कॉलेज
फोटो: डॉ. दिलीप धींग का सम्मान करते भट्टारक धवलकीर्ति

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