तम्बोला नामक जुआ का बढ़ता क्रेज

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डॉं. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ – भारत में सार्वजनिक रूप से मेले-ठेले या होली-दिवाली मिलन पर तो ताम्बोला का आयोजन हो ही रहा है, अब यह ‘हिंदू नव वर्ष’ समारोह में इसे बड़े किया जाने लगा है। षौक से आयोजित होते देखा जाने लगा है। यही नहीं, जो समाज अपने आप को जुआ से हमेषा दूर रखती आई है ऐसी जैन समाज भी इस जुआ मिश्रित खेल के आयोजनों से रोक नहीं पायी है। क्यों कि यह खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है। पर पैसे दांव पर लगे होने से जूए का ही एक स्वरूप है।

गगन शर्मा ने लिखा है कि तम्बोला, हाउजी या बिंगो, एक ही ‘बोर्ड खेल’ के विभिन्न नाम हैं। जो दुनिया भर में और भी नामों से खेला और पसंद किया जाता है। वैसे तो यह आयातित खेल वर्षों से हमारे यहां भी खेला जा रहा है, पर इधर कुछ सालों से इसकी लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ी है और अभी भी बढ़ती ही जा रही है। यह महिलाओं की ‘किटी पार्टियों’ का तो एक आवश्यक अंग बनने के साथ-साथ मेले-ठेले-उत्सवों इत्यादि में भी अपनी पैठ बना चुका है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसका रोमांचक स्वभाव, संभावना-युक्त और सरल होना है जिसके कारण कोई बच्चा भी इसे खेल सकता है।

दुनिया भर में यह कई तरह से खेला जाता है पर मूल पद्यति एक जैसी ही होती है। भारत में खेले जाने वाले इस खेल के दो भाग होते हैं- एक तो खेलने वाले, जिनकी संख्या कुछ भी हो सकती है, उन्हें एक पर्चीनुमा टिकट दी जाती है, जिसकी तीन पंक्तियों में एक से नब्बे तक के अंकों में से कोई पंद्रह अंक, हर पंक्ति में पांच के हिसाब से छपे होते हैं। दूसरा भाग खिलवाने वाले का होता है जिसमें एक, दो या अधिक लोग होते हैं। उनके पास एक बोर्ड, जिसमें सिलसिलेवार एक से नब्बे अंकों से अंकित खाने बने होते हैं तथा एक कटोरेनुमा बर्तन होता है, कई जगह एक घूमने वाला यंत्र भी उपलब्ध होता है, जिसमें एक से नब्बे तक के अंकित छोटे-छोटे खेलने वाले को एक निश्चित दर पर पर्ची बेची जाती है तथा संग्रहित पैसों से जीतने के विभिन्न मानक तय कर दिए जाते हैं और पूरी राशि को विभिन्न मानकों में बाँट दिया जाता है। जैसे किसी भी पंक्ति के पाँचों नंबर कट जाने पर कुछ राशि, पर्ची पर के किनारे के चारों नंबर कटने पर कुछ राशि, जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पांच अंक कट जाएं उसे कुछ राशि इत्यादि।

उसके बाद जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पूरे पंद्रह यानी सारे नंबर कट जाएं, जिसे ‘फुल हाउस’ कहा जाता है, उसे विजेता माना जाता है और सबसे ज्यादा राशि उसी को मिलती है। खेल शुरू होने पर खिलवाने वाला व्यक्ति कटोरे में से बिना देखे एक नंबर उठा, उसे सबको बतला कर बोर्ड में बने उसी नंबर की जगह में रख देता है। खेलने वाले की पर्ची में यदि वह नंबर हो तो वह उसे काट देता है, नहीं तो अगले अंक का इंतजार करता है। इसी तरह खेल तब तक चलता रहता है जब तक किसी का फुल हाउस ना हो जाए। फुल हाउस होने पर खिलाड़ी को अपनी पर्ची खिलवाने वाले को पेश करनी पड़ती है, जो अपने बोर्ड से उसके नंबर मिला जीत निश्चित करता है। यदि कहीं चूक हुई होती है तो वह पर्ची ‘बोगी’ कहलाती है और खेलने वाला बाहर हो जाता है। वैसे तो खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है ! पर पैसे दांव पे लगे होने से जूए का ही एक स्वरूप है।

जैन समाज भी अपना रही इस मनोरंजक जुआ को

इस खेल की लोकप्रियता के चलते जुआ न खेलने की सौगंध वाली जैन समाज भी इसे अपना रही है। जिस समाज में- ‘जुआ आदि का त्याग नहीं वह व्यक्ति श्रावक नहीं, पाणिग्रहण संस्कार में पहला वचन यही होता है कि वे कभी जुआ नहीं खेलेंगे, उसी समाज में पर्व के दिनों में यह खेल बड़े उत्साह के साथ आयोजित किया जाता है। और इसे नाम दिया जाता है ‘धार्मिक ताम्बोला’। इसे आयोजित करने का तर्क यह दिया जाता है कि यह धार्मिक है, इसलिए जुआ नहीं है, क्योंकि इसमें धार्मिक प्रश्न पूछे जाते हैं। लेकिन विचारणीय है कि जिन आयोजनों में इसका टिकिट निःशुल्क दिया जाता है उसे तो स्वस्थ मनोरंजन कहें, इसमें कोई संदेह नहीं है, किन्तु, जिन आयोजनों में 100-200 रुपये प्रति टिकिट बेचे जाते हैं, फिर उसी राशि से विजेताओं को राशि दी जाती है, इसे किस श्रेणी में रखेंगे। एक मंच से तो घोषणा भी की गई कि ‘आज त्याग का दिन है, विजोता अपनी जीत की राशि या सामान यहीं पर दान में भी देकर जा सकते हैं।’ एक समारोह में विजेता के लिए 10 ग्राम सोना भी  रखा गया था।

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