सौम्यता, सहजता और संघर्षों की प्रतिमूर्ति– माँ ,बहिन, पुत्री रूपा स्वर्गीय श्रीमती सरोज जैन जबलपुर

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सरोज का जन्म जबलपुर के उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था .दादा लोकमन जैन के ज्येष्ठ पुत्र श्री प्रेमचंद जैन से धार्मिक संस्कार मिले तो सुप्रसिद्ध मुन्नू बप्पू खानदान की पुत्री समुंद्री जैन से उन्हें कुशल ग्रहणी के अलावा सहनशक्ति मिली .प्रारम्भिक दौर में पारिवारिक स्थिति अनुकूल न होने से संघर्ष का पाठ घुट्टी में सभी भाई बहिनो को विरासत में मिली .सरोज शुरुआत से कुशाग्र बुद्धि की धनि थी ,उन्होंने मेट्रिक तक अध्ययन किया .उस समय अधिक अध्ययन की स्वीकृति परिवार से नहीं थी .
पढाई के बाद माता जी से गृह कार्यों में निपुणता पायी तो पिता जी से धार्मिक संस्कारों के साथ जीवन में समता भाव कैसे अपनाएं .ऐसी शिक्षा उनको कूट कूट का भरी .बुद्धि की तीव्रता इतनी थी की कोई भी दर्शन ,स्थान पर्यटन कहाँ कैसे कितनी दूर हैं और वहां कौन कौन भगवन की मूर्तियां विराजित हैं का जीवंत शब्दकोष थी .
उनकी विवाह जबलपुर के हृदय स्थल श्याम टाकीज़ क्षेत्र सतना बिल्डिंग के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र निवासी श्री रामचंद्र जी जैन माना के ज्येष्ठ पुत्र श्री वीरेंद्र जैन उर्फ़ वीरा से २० मई १९७० में हुई थे ,प्रारंभिक दौर विषम थे .बड़ा परिवार सास ससुर ,दो देवर, दो ननद का रहना दो कमरों के मकान में रहना पर सरोज ने कभी भी अपने मायके वालों से कोई भी शिकायत नहीं की और अपने सौम्य सरल व्यवहार से उन्होंने परिवार ,नाते रिश्तेदारों में अपनी स्वच्छ छवि बनायीं .ऐसी मान्यता दी गई की जिस दिन से सरोज की शादी के बाद उनके परिवार में सुख सम्पन्नता आयी और वीरा ,वीरा सेठ के नाम से विख्यात हुए ,उनका पहले रिक्शा किराये पर चलाने का व्यवसाय था ,उसमे परिवर्धन कर जैन साइकिल संसथान स्थापित कर कई स्थान पर अपना व्यापार बढ़ाया ,इस काम में उनके अनुज श्री राजेंद्र (राजू सेठ ) श्री अभय सेठ के साथ उनके पुत्र श्री तरुण ने खूब काम बढ़ाया और सामाजिक ,आर्थिक, धार्मिक, व्यवसायिक क्षेत्रो में स्थापित हुए .उनकी बहिन उमा बहिन जी विवाह किया उसके बाद दोनों भाइयों की शादी की और अपनी पुत्री रेखा की शादी ,पुत्र तरुण की शादी के बाद दूसरी पुत्री ऋतू जैन की शादी करके महती जिम्मेदारी निभाई .
स्वास्थ्य ख़राब होने से उनकी आकस्मिक मृत्यु के कारण उनके अनुज राजू सेठ अब्बू सेठ के साथ तरुण सेठ ,राहिल सेठ साहिल सेठ ने मिलकर व्यापार में श्री वृद्धि की
सरोज ने बहुत बड़े परिवार को जिसमे दो दो देवरनियां ,तीन बहुओं के साथ अनेको नाते रिश्तेदारों से जीवंत सम्बन्ध बनाये और जो एक प्रतिष्ठित परिवार के प्रमुख के रूप में सभी सदस्यों के सहयोग से धार्मिक, सामाजिक ,व्यवहारिक संबंधों का भरपूर निर्वहन किया .
उम्र के साथ शारीरिक कष्टों को सहना पड़ता हैं पर उन्होंने जन्म से संस्कारों से धर्म बोध से साम्य भाव से भोगा .उनके सौम्य सरल स्वाभाव से उनके देवर देवरियां भतीजे भतीजियों को उन्होंने मातृवत प्रेम दिया .
मनुष्य सम्पूर्ण विकार रहित नहीं हो सकता हैं ,उनके व्यवहारों से उनके निजियों को कष्ट होना स्वाभाविक हैं .उनका मुझसे भी विशेष लगाव रहता था .अंत समय में उनको मानसिक कष्ट भी अधिक थे पर उन्हें में सम्बोधित करता रहा की आप धरम को मत छोडो ,समता भाव रखो अपना सुधार कर स्वर्ग सुधारों ,सद्भावना सभी से रखो .अपना चिंतन स्वस्थ्य रखो और धर्म के प्रति जाग्रत रहों.
उनका अंत समय जाग्रत अवस्था में भगवन का नाम लेते हुए निकला और सम्मेदशिखर वंदना का स्मरण करती रही .
जैसा कहा जाता हैं की -जन्म के समय होनहार बिरमान के होत चीकने पाद वैसा ही अंत समय बताता हैं कि उनका जीवन कैसा रहा होगा .मृत्यु अत्यंत दुखदायी होती हैं पर जाग्रत अवस्था में प्राण निकले बहुत श्रेष्ठ माना जाता हैं .
श्रीमती सरोज अपने पीछे बहुत बड़ा परिवार सुख सम्पन्नता से छोड़कर गयी .उनका मायका पक्ष भी बहुत विस्तीर्ण हैं तो उनका ससुराल पक्ष बहुत समृद्ध हैं .परिवार जनो से अपेक्षा हैं किउनके सद्विचार और चलायी गई परम्परा का निर्वाह करेंगे ,वही सच्ची श्रद्धांजलि होगी .
ईश्वर उनको सद्गति दे यही हम सब कामना करते हैं और उनके परिवार को इस दारुण कष्ट सहन करने की सहन शक्ति दे .
जैन साइकिल परिवार जबलपुर
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५३

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