सौहार्द का महापर्व क्षमा वाणीपर्व

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भारतीय संस्कृति एक गौरवशाली संस्कृति है यहां के पुनीत धरा पर धर्म व आध्यात्म की पावन धाराओं ने न केवल जन जीवन को विशिष्टता प्रदान की है वरना संपूर्ण विश्व की नजर में अद्वितीय स्थान बनाया है ।मगर वर्तमान परिदृश्य में हमारी नैतिकता, चरित्रिक उत्थान एवं आध्यात्म की युगयुगांत कालीन परंपरा में दरार डालने वाली बाहरी एवं भीतरी ताकतों से संघर्ष का दौर शुरू हो गया है। ऐसे में सहनशीलता एवं क्षमा की बड़ी आवश्यकता है। जिससे विश्व में सुख शांति का वातावरण तैयार हो सकेगा।
क्षमा में वह शक्ति, वह शांति वह संतुलन है जो हमें संसार में कहीं नहीं मिल सकती। क्योंकि जीवन की राह पर कई बार अनचाहे ही कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती है जो अपनों का दिल दुखा जाती है किंतु क्षमा मांगना या क्षमा करना हृदय की उदारता है। जो पिछली बातों को भूलकर नई शुरुआत का आगास कराती है।
यदि मन जख्मी है तो क्षमा के पास उसे भरने की क्षमता है ।यदि क्रोध बीमारी है तो क्षमा उसकी औषधि है। और यदि कषाय अंधकार है तो क्षमा सूर्य की किरणे है ।
क्षमा आत्मा का स्वभाव है। सहिष्णुता ,समता और सौजन्य क्षमा की पर्याये है ।सामर्थ्य और क्षमता संपन्न व्यक्ति ही क्षमा धारण करता है ।और यह वीरो का लक्षण है इसलिए क्षमा वीरस्य भूषणम कहा गया है।
जैन संप्रदाय के जन-जन का कल्याण करने वाले पर्युषण पर्व के उपसंहार के अवसर पर क्षमावणी दिन मनाया जाता है जो विश्व मैत्री का भी संदेश देता है ।इसे क्षमवाणी पर्व कहते हैं ।जो सौहार्द, सौज्यनता, समन्वय और सदभावना का महान पर्व है ।अपने संबंध अच्छे बनाए रखने के लिए सौहार्द, सद्भाव, सहयोग और समादर यह चार गुण हमें अपने साथ रखने की आवश्यकता है ।सौहार्द का मतलब होता है जिनके प्रति संबंध अच्छे हैं उनके प्रति मेरा मन उदार बने ।सौहार्दता से उदारता बढ़ती है ।उदारता संबंधों में मिठास लाती है। हम सामने वाले के प्रति अधिक सकारात्मक बनते हैं ।उसमें छोटी-मोटी गलतियां नजर अंदाज करने की क्षमता हममें आती है ।हम हमेशा सामने वाले को अपने गले लगाते हैं। मन में यदि गांठ है, द्वेष है, वैर है, नफरत का भाव है तो समझना हमारे मन में सामने वाले के प्रति सौहार्द का अभाव है ,उसके प्रति नफरत ही रहेगी।और जिसके प्रति सौहार्द है उसके प्रति प्रेम अपने आप उमड़ेगा। और जहां प्रेम होगा वहा प्रगाढता अपने आप आएगी ।उसकी बुराई में भी अपने को अच्छाई ही दिखाई देती है। के सद्भाव का मतलब एक दूसरे के गुणो को सहना, उसके गुणो की प्रशंसा का भाव होना ,एक दूसरे के भले की भावना रखना ।उसके प्रति ईर्ष्या न रखना। सहयोग मे एक दूसरे को साथ निभाने की कोशिश करना है। एक दूसरे की परेशानी को अपनी परेशानी समझकर उसे सहयोग करने से वह जीवन भर अपना हो जाता है। और समादर मे एक दूसरे के प्रति आदर भाव रखने से संबंधों की रक्षा होती है ।यह सब गुण हममें है तो अपने आप संस्कृति की रक्षा होगी और क्षमावणी पर्व मनाना सार्थक होगा ।
वसुधैव कुटुम्बकम ,की ऊक्ति वास्तव में क्षमावाणी पर्व के माध्यम से चरितार्थ होती है। यह पर्व आत्मानःप्रतिकुलानि परेशां न समाचरेतकी शिक्षा प्रदान करता है।इस पर्व पर सत्वेषुमैत्री* और मैत्री भाव जगत में सब जीवो से नित्य रहे जैसी सूक्तियां चरितार्थ होती है ।और सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया की प्रेरणा प्रदान करता है।

क्षमावाणी यह धार्मिक पर्व तो है ही परंतु उससे बढ़कर यह सामाजिक पर्व भी है ।क्योंकि विश्व के सभी धर्म और परम्पराओं में इस धर्म का पालन होता है ।प्रत्येक संस्कृति के दार्शनिकों ने, चिंतकों ने ,संत महात्माओं, ने क्षमा का अद्भुत परिचय हमारे लिए दिया है।
वाल्मीकि रामायण में कहा है “क्षमा यशः क्षमा धर्मः “अर्थात क्षमा यश है ,क्षमा धर्म है। भगवान महावीर ने कहा “क्षमा वीरस्य भूषणम,” सिखों के गुरुगोविंद सिंह ने कहा क्षमा शूर वीर ही कर सकता है, कायर व्यक्ति कभी भी क्षमा नहीं कर सकता। मोहम्मद इकबाल ने लिखा है मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना, हिंदी है हम, वतन है हिंदोस्ता हमारा। राष्ट्रपिता गांधी जी ने अपने जैन मित्र रायचंद जैन से अहिंसा ,सत्य, क्षमा आदि को बहुत अच्छेसे जाना, समझा और जीवन में उतारा। क्योंकि ऐसे उदात्त चरित्र वाले महामानवो के लिए सारी पृथ्वी के लोग अपने ही समान जान पड़ते हैं। इसलिए उन्होंने समस्त प्राणी मात्र में आत्मा का अस्तित्व मानकर सबसे क्षमा और मैत्री के भावों को विस्तृत बनाकर शांति के सर्वोच्च मार्ग को अपनाने का संदेश दिया है।और कहा है
“मानव को क्रोध से नहीं प्रेम से जीतो। क्रोध को क्रोध से नहीं क्षमा से जीतो, यदि किसी का दिल जीतना चाहते हो तो अधिकार से नहीं समर्पण से जीतो।”।
हमारे वैचारिक, सामाजिक , राष्ट्रीय एवं वैयक्तिक समस्याओं के समाधान के लिए क्षमा गुण अद्भुत गुण है जिससे मन स्वच्छ बनकर समाज में भाईचारा स्थापित हो सकता है।
क्षमा एवं मैत्री के संदेश से आपसी कलह एवं एवं युद्धोंसे होने वाली क्षति को रोका जा सकता है। क्षमा के अवलंबन से न्यायालयो की भीड़ कम हो सकती है। तेजी से बढ़ रही अनिद्रा एवं रक्तचाप जैसी असाध्य बीमारियों को रोकना क्षमा द्वारा सहज संभव है ।टूटते हुए संयुक्त परिवारों को क्षमा के सहारे बिखरने से बचाया जा सकता है। मानव मानव के बीच आज जो अविश्वास का संकट उपस्थित है उससे मुक्ति का मार्ग क्षमा ही है।
क्षमावाणी पर्वके इस पावन अवसर पर अपने अंदर ऐसी विशाल विचारधाराओं को लाए जिससे हम दुनिया में प्रेम का, भाईचारे का, सद्भावना का बीजा रोपण कर सके ।
आज यह पर्व आधुनिकता के भेंट चढ़ चुका है। आत्म कल्याण का यह महान पर्व जो मनो मालीन्य ने धो डालने में पूरी तरह से समर्थ है ,आज मात्र शिष्टाचार बन चुका है। आजकल क्षमा याचना की प्रक्रिया हृदय से न होकर मात्र औपचारिकता वश होती है ।परंतु औपचारिक रूप से क्षमा याचना करने मे भी साहस और हिम्मत जुटाना होता है जो कायरता का प्रतीक नहीं है।
क्षमावाणी पर्व का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर एकता को बढ़ावा देना है। जिसमे हम सब का हित है ।हम सभी श्वेतांबर, दिगंबर और अन्य पंथो, धर्मो के बंधन को तोड़कर आपसी भाईचारा बढ़ाकर धर्म और सामाजिक हित में आगे बढ़ना चाहिए।
आज वर्तमान भौतिक विश्व विद्य्वंसक शस्त्रो की होड और युद्ध की ज्वालाओकी कगार पर खड़ा है। वह भी विश्व में शांति की कांक्षा करता है परंतु स्वयं के अंदर, हृदय में क्षमाको स्थापित किए बिना विश्व शांति की कामना एकमात्र छल है। क्षमा को स्वीकार किए बिना वह तीन काल में भी संभव नहीं है ।आपसी वैमनस्य, प्रभुता, स्वार्थता, वरीयता का त्याग किए बिना विश्व में शांति असंभव है।
अतः क्षमावाणी पर्व के माध्यम से वैर एवं विद्वेष का जहर समाप्त हो ,तथा सौहार्द और सहिष्णुता की गंगा प्रवाहित होकर जन जन मे आत्म शांति का विकास हो। भय और संताप का वातावरण समाप्त होकर सहयोग और शांति की शीतल धारा प्रभावित होती रहे यही मंगल कामना।
श्री संपादक सादर जय जिनेन्द्र।
क्षमवाणी पर्व के विशेषांक मे यह आलेख प्रकाशित कर उपकृत करे
धन्यवाद
महावीर दिपचंद ठोले,औरंगाबाद महाराष्ट्र

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