महिला ड्रेसकोड़ का मतलब शालीनता और मर्यादित पहनावा

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वैसे खान पान पूजा पाठ पहिनावा ये सब व्यक्तिगत मामला होता हैं। जब हम एकाकी हो तब कुछ भी कैसा रहो पर जब समाज ,धार्मिकसामाजिक समूह में जाना हो वहां वहां के अनुसार परिधान /पहनावा होना करना चाहिए। जैसे विद्यार्थी जीवन में हमको यूनिफार्म में स्कूल जाना पड़ता हैं वह अनुशासन के साथ समानता का प्रतीक हैं। ऐसा सब जगह ड्रेस कॉड होता हैं मिलिट्री ,पुलिस ,डॉक्टर ,वकील सब अपने अपने ड्रेस कॉड से पहचाने जाते हैं।
आज की नारी पैसा कमाने के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिये तैयार है । आपका ड्रेसकोड कैसा है,हमारी नानी दादी पर्दे में रहती थी । उन्होने कभी अपना ड्रेस कोड नही तोड़ा और इसलिए वो सुरक्षित है और ड्रेसकोड तोडने वाले असुरक्षित है*
उतर गया घूँघट,सर खुला हो गया और अब तो तन भी खुला हो गया । केवल धर्मस्थान पर मर्यादा है पर वह भी कम से कमतर होती जा रही हैं और बाहर निकलते है सब खुला है । पहले के जमाने श्रंगार केवल पति को रिझाने के लिये किया जाता था,अब दुनिया को दिखाने के लिये किया जाता है । लडकियो के ,महिलाओं के कपडो में सूट में कितने कट होते है पीठ पर,पेट पर,गले में ,कन्धों पर, बाँहो पर कट । पहले पहनावे में पेट और पीठ नही दिखती थी,अब जैनियों का या हिन्दुओं का भी एक शालीन ड्रेसकोड तय होना चाहिये,ये बात आपकी सुरक्षा के लिये हो रहा हैं लड़कियों और महिलाओं पर जितने अपराध हो रहे है उसमें घटिया पहनावा सबसे बडा कारण है । यदि इस पर कोई टोकता हैं तो उनका उत्तर होता हैं की आपकी सोच घटिया हैं और आपकी नज़र ख़राब हैं।
अपने गाँव या शहर में तो और भी आपका पहनावा ठीक रहता है लेकिन जब आप घूमने जाते हो तब आपका पहनावा कैसा होता है ?आप स्वंय विचार करो उसके ऊपर आप फेसबुक, वॉट्सएप्प,और अन्य सोशल मिडिया में बड़ी शान से फोटो पोस्ट करते हो,और तो और वाटर पार्क के नहाते हुए फोटो पोस्ट करते हो। फिर तुम अपने बच्चों से संस्कार की उम्मीद क्यों करते हो । बच्चे और बच्चियों को बचपन से ही ऐसी ड्रेस ,शालीन ड्रेस दिलाओ की बाद मे हो कट वाले या फटे कपडे नही माँगे । तुम्हारे तन पर कामुक भेडीयों की नजर नही पड़े ऐसा पहनावा हमेशा धारण करो ।
अपनी संतान को आप कैसा बनाना चाहते हो महावीर जैसा,गौतम जैसा, दिवाकर जैसा,राम जैसा । बेटे को राम जैसा बनाना है तो स्वंय को दशरथ जैसा बनाना पडेगा ।*
सन्तान को संस्कारी बनाने के लिये उपदेश मत दो खुद अपने आप को सुधार लो,बच्चा खुद संस्कारी बन जाएगा अपने बाल का और पहनावे का हमेशा ध्यान रखना ये हमारा चरित्र बयां करते है । चव्वनी छाप बाल कभी मत कटवाओ । धन वैभव सम्पन्न होते हुए भी फटे कपडे पहनते हो हाथ में कटोरा ले लो । अगर आप लक्ष्मी को मानते हो तो ये भी जान लो की फटे कपडे पहनने वालों से लक्ष्मी रूठ जाती है,लक्ष्मी कहती है जब मैने इसको संपन्न बनाया और ये फटे कपडो में घूम रहा है तो इसे फटेहाल ही बनाना ठीक रहेगा ।
इसके अलावा शादी शुदा महिलाएं अपने आपको शादी शुदा नहीं दिखाना चाहती हैं। जिस कारण कभी कभी उनके साथ दुर्घटना होने का अंदेशा रहता हैं। जब वे अपनी संतान होने के बाद संतानहीन जैसा दिखावा करती हैं तब उनकी संतानों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा।
फ़िल्मी दुनिया टी वी संस्कृति हमको नग्नता सिखाती हैं पर क्या उन जैसी पोशाक आप अपने माँ बाप भाई बहिन लड़के के सामने पहन सकती हैं। यदि नहीं तो ऐसी पोशाक को किसी अन्य के सामने क्यों पहने।
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल A2/104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट ,होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753

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