लेखक – मयंक कुमार जैन

0
3

लेखक – मयंक कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक मंगलायतन विश्वविद्यालय अलीगढ़ उत्तर प्रदेश
होली और जैन जीवन दर्शन:
भारतीय संस्कृति उत्सवों की एक अनंत श्रृंखला है, जहाँ प्रत्येक पर्व मानवीय संवेदनाओं और आध्यात्मिक सत्यों को प्रकट करने का माध्यम बनता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का पर्व सामान्यतः रंगों, गीतों और उल्लास का पर्याय माना जाता है। किंतु जब हम इस उत्सव को जैन जीवन दर्शन के सूक्ष्म सिद्धांतों की कसौटी पर परखते हैं, तो इसके अर्थ और भी गंभीर, संयमित और आत्मिक हो जाते हैं। जैन दर्शन केवल बाह्य क्रियाकांडों का मार्ग नहीं है, बल्कि यह ‘स्व’ के शोधन की प्रक्रिया है। इस दृष्टि से होली केवल चेहरे पर गुलाल मलने का नाम नहीं, अपितु आत्मा पर चढ़े कर्मों के मैल को धोने का एक आध्यात्मिक अवसर है।
जैन परंपरा में पर्वों का वास्तविक प्रयोजन ‘कषायों’ का उपशमन करना होता है। लोक-परंपरा में जहाँ होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, वहीं जैन दर्शन इसे अंतर्मन की अशुद्धियों—क्रोध, मान, माया और लोभ—के विसर्जन के रूप में देखता है। अग्नि जिस प्रकार काष्ठ को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार एक साधक को अपने भीतर धधक रहे अहंकार और द्वेष की समिधा को ज्ञान की अग्नि में होम कर देना चाहिए। वास्तविक होली वही है, जहाँ व्यक्ति अपने पुराने वैर-विरोध को जलाकर विवेक की राख से तिलक करे। यह दहन जड़ पदार्थों का नहीं, बल्कि उन विजातीय भावों का होना चाहिए जो आत्मा को संसार चक्र में बांधे रखते हैं।
अहिंसा, जो जैन धर्म का प्राण है, होली के उत्सव में एक नई दिशा प्रदान करती है। आधुनिक समय में होली जिस प्रकार जल के अपव्यय और रासायनिक द्रव्यों के प्रयोग का केंद्र बन गई है, वह जैन जीवन शैली के ‘यतना’ (सतर्कता) और ‘दया’ के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। जैन दर्शन सूक्ष्म जीवों की रक्षा का संदेश देता है। अतः एक विवेकवान श्रावक के लिए होली का अर्थ प्रकृति का संरक्षण और जल-कायिक जीवों के प्रति करुणा भाव है। फूलों के पराग या प्राकृतिक गुलाल से तिलक लगाकर प्रेम व्यक्त करना, ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ के सूत्र को चरितार्थ करता है। यहाँ आनंद का आधार हिंसा नहीं, बल्कि अहिंसक सौहार्द है।
इस पर्व का एक अत्यंत सुंदर पक्ष सामाजिक समरसता और क्षमापना है। जैन धर्म का मूल मंत्र ‘मित्ती मे सव्व भूएसु’ (मेरी सभी जीवों से मित्रता है) होली के दिन व्यावहारिक धरातल पर उतरता है। साल भर की छोटी-मोटी कड़वाहटों को भूलकर जब व्यक्ति एक-दूसरे के गले मिलता है, तो वह अनजाने में ही जैन धर्म के ‘खमतखामणा’ (क्षमा याचना) के संस्कार को जी रहा होता है। यह पर्व सिखाता है कि क्षमा का गुलाल यदि एक बार मन पर चढ़ जाए, तो जीवन का प्रत्येक दिन फाग बन सकता है। यहाँ पिचकारी से निकलने वाली धारा केवल रंगीन पानी नहीं, बल्कि हृदय से निकली करुणा की गंगा होनी चाहिए जो सामने वाले के प्रति संचित द्वेष को धो दे।
जैन जीवन दर्शन हमें इन्द्रिय संयम और सात्विकता का पाठ पढ़ाता है। जहाँ दुनिया इस दिन उन्माद और नशे में डूबी नजर आती है, वहीं जैन श्रावक इस दिन को मर्यादाओं के भीतर रहकर मनाता है। सात्विक भोजन, मर्यादित भाषा और शालीन व्यवहार ही इस उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। वास्तविक उत्सव वह नहीं जो हमें स्वयं से दूर ले जाए, बल्कि वह है जो हमें अपनी आत्मा के निकट लाए। फाल्गुन की यह पूर्णिमा हमें स्मरण कराती है कि बाहरी रंग तो क्षणभंगुर हैं, धूप और हवा के झोंके के साथ उतर जाएंगे, किंतु जो रंग संयम और तप की भट्टी में पककर आत्मा पर चढ़ता है, वह शाश्वत होता है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, होली और जैन जीवन दर्शन का मेल ‘जड़’ से ‘चैतन्य’ की ओर बढ़ने का संदेश है। यह पर्व हमें बताता है कि उत्सव और अध्यात्म दो विपरीत किनारे नहीं, बल्कि एक ही नदी के दो तट हैं। यदि हम विवेक और अहिंसा की मर्यादा को साथ रखें, तो होली का हुड़दंग एक पवित्र अनुष्ठान में बदल सकता है। जब तक भीतर की बुराइयाँ नहीं जलतीं और जब तक मैत्री का सच्चा रंग नहीं चढ़ता, तब तक बाह्य रंग फीके ही रहेंगे। अतः, आइए इस होली पर हम बाह्य प्रपंचों से हटकर आत्म-गुणों की होली मनाएं, जहाँ क्षमा का अबीर हो, संतोष का केसरिया रंग हो और अहिंसा की शीतल बौछार हो। यही जैन संस्कृति का वास्तविक फाग है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here