क्या कभी सोचा हैं कि फटाके कितने घातक होते हैं ?

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बंगलुरु  में घटी फटाखा दूकान गोदाम अग्निकांड में जिस तरह से कार्यरत कर्मचारी जल कर ख़ाक हुए और सरकार ने उनके परिवार जनों को पांच पांच लाख रूपया देकर इतिश्री कर ली। क्या सरकार के द्वारा उसे स्वीकृति दी गई हैं। ?क्या फटाका निर्माण और उनका उपयोग कितना आवश्यक हैं। ?मनोरंजन हमेशा मृत्युपरक होता हैं
हम जब भी कोई उत्सव /मनोरंजन /ख़ुशी व्यक्त करते समय कभी कभी ऐसी सामग्री का उपयोग करते हैं जो स्वयं के लिए भी दुखदायी हो जाती हैं .जैसे एक शादी में एक सज्जन ने बड़े उत्साह से अपनी दुनाली बन्दूक से गोली चलाई और वह धोखे से सही ढंग से न चलकर ,एक व्यक्ति जो उसका नजदीकी रिश्तेदार था को लगी और तुरंत मौत हो गयी.शादी में रंग में भंग हुआ और दुनाली चलाने वाला दो तीन वर्षों त(क लापता रहा  और मरने वाला अकाल काल के गाल में समां गया .कभी कभी सामाजिक उत्सवों में ये घटनाएं  अधिकांश होती हैं .मैचों की  जीत हार में इसका उपयोग बहुत होता हैं  इसी प्रकार दीवाली तो विशेषकर फाटकों का ही त्यौहार माना जाता हैं . और इसमें उत्साह ,उमंग का होना अनिवार्य हैं .आज हम पढ़े लिखे ,बौद्धिक हो चुके हैं .क्या हमें जब कोई काम करना होता हैं तो उसमे अपना विवेक जाग्रत कर काम नहीं करना चाहिए.जिस काम से हमें ०% लाभ होता हैं और 100 % हानि होती हैं क्या ऐसा कार्य करना जरुरी हैं .?
आतिशबाज़ी बनाने वालों और प्रयोगशाला में काम करने वालों ने मिलकर फाटकों की जाँच की तब पाया गया कि इनमे पारा और सीसा बहुत अधिक पाया जाता हैं जो न केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए वरन पर्यावरण के लिए अत्यंत हानिकारक हैं . ये खरतनाक तत्व हमारे शरीर में दस दस वर्ष तक नुक्सान पहुंचाते हैं .यहाँ फटाके चार श्रेणी में रखे गए हैं १  धमाके वाले — प्रेसर के लिए भरते हैं  गन पाउडर  रस्सी बम्ब में .074 % सल्फर और ०.73  % कार्बन  मिला रहता हैं  .दूसरे वॉइस टेस्ट (आवाज ) अधिकतम 117  डेसीबल .सामान्य तौर से फटाकों के उपयोग से बचे और मनुष्य 85  डेसीबल तक आवाज सहन कर सकता हैं .
2   रोशनी वाले –हर रंग के लिए अलग अलग साल्ट — फुलझड़ी में पारा 14 .२१ पी पी एम् (प्रति 10  लाख ग्राम ) सीसा 16 .30  पी पी एम् मिला रहता हैं ,पारा हमारे पाचन तंत्र को कमजोर करता हैं .सीसा बच्चों के नर्वस सिस्टम और किडनी को नुक्सान पहुंचाता हैं .छह साल के बच्चों और फेफड़ों के मरीज़ों के लिए घातक होता हैं . फेफड़ों के मरीज़ आतिशबाज़ी से दूर रहे .
3  उड़ने वाली –हलकी फ्लू गैस उड़ाती हैं रॉकेट — 12  रंगों में फूटने वाले रॉकेट में कार्बन 32 .68  % मिला होता हैं और इसमें सीसा और पारा पाया गया हैं . रॉकेट के प्रदुषण से कैंसर ,अस्थमा ,मिर्गी जैसे रोग हो सकते हैं . हाई ब्लड प्रेसर ,अस्थमा आदि के मरीज़ एक मिनिट भी ऐसे फाटकों के बीच न रहे .
4  घूमने वाली — नाली में  से फ्लू गैस निकलती हैं तो घूमती हैं — चकरी में 100  ग्राम में ०.73 % सल्फर और 8 % कार्बन पाया जाता हैं जो खतरनाक हैं सल्फर   और कार्बन दोनों दिल और फेफड़ों के लिए बेहद खतरनाक हैं इनसे निकलने वाला धुआं बीमारी की जड़ हैं .चाकरी की बच्चों को दिखाने के चक्कर में बिलकुल न लाएं .
चीनी फाटकों में ज्यादा पोटेसियम क्लोरेट की मात्रा होती हैं ,ये तेज़ी से जलते हैंऔर रोशनी भी ज्यादा निकलती हैं .इसीलिए ये आँखों और फेफड़ों के लिए अधिक खतरनाक हैं . बच्चों को ११% अधिक खतरा रहता हैं .
अरबों रुपये की व्यर्थ में बर्बादी —फटाखों के रूप में हम एक दिन में अरबों रुपयों में आग लगा देते हैं और नुक्सान ही नुक्सान .उतने रुपयों से हम हजारों परिवारों का पेट पाल सकते हैं .इस दौरान आग लगने से अमूल्य सम्पत्ति का नुक्सान होता हैं और अनेक परिवारों का जीवन अंधकारमय हो जाता हैं . गर्भस्थ शिशुओं एवं बच्चों को नुक्सान होता हैं अनेक गंभीर बीमारियां हो जाती हैं कभी कभी शिशु जन्मजात बहरे हो जाते हैं वायु ,जल ,ध्वनि और मिटटी का प्रदुषण होने से हमारे जीवन के लिए प्राणघातक हैं .पूरे वर्ष पर्यावरण का सम्हाल रखना और एक दिन में उसे यूँ बर्बाद करना क्या यह समझदारी की निशानी हैं . अनेकों जीव जंतुओं की हत्या होती हैं पशुओं का गर्भपात हो जाता हैं महापर्व पर महापाप का यह तांडव कितना उचित हैं ,
आखों एवं कानों पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं श्वाश के रोगियों के लिए यह महापर्व आराधना का नहीं अपितु महा यातना का पर्व बन जाता हैं . उन्हें अनचाही कैद का सामना करना पड़ता हैं .इस कुकृत्य के ज़िम्मेदार क्या फटाका फोड़ने वाले नहीं हैं? ग्लोबल वार्मिंग का खतरा कार्बन डाई ऑक्साइड एवं हानिकारक गैसों के कारण वायुमंडल दूषित होता हैं जिससे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ता जाता हैं . किसी भी धर्म  में हिंसा करने ,दूसरों को पीड़ा पहुचाने का उपदेश नहीं दिया हैं हम फटाके फोड़कर प्रकृति को नुक्सान पहुंचा रहे और अनेक जीव जंतुओं को जिन्दा जलाकर ईश्वर की वाणी /उपदेश का अनादर कर रहे हैं .
बम विस्फोट करने वालों को हम आतंकवादी कहते हैं तो विश्व में प्रतिवर्ष पटाखों की आग से लाखों लोग अंधे /बहरे/घायल हो जाते हैं तथा हज़ारों की मौत हो जाती हैं पटाखा प्रेम के दुष्परिणाम देखने दीवाली के बाद अगले दिन नगर के अस्पतालों में जरूर जाएँ और फिर विचार करे कि हम कौन हैं .
पूछता हूँ में पटाखे जलाने वाले इंसान से
क्यों मार रहा हैं तू मूक जीवों को जान से ?
वो भी विरोध करते पटाखों को ना जलाने का
लेकिन कह नहीं सकते बेचारे अपनी जुबान से
जल जाते हैं मकान ,दुकान और कारखाने ऐसे काम से
बहुत हिंसा हो जाती हैं इस व्यर्थ के इस काम से
क्या पटाखों के बिना हमारी दीवाली नहीं हो सकती
मुर्ख और होशियार ! सभी सोचना अपने ज्ञान से ?
नहीं जलाना अब पटाखें कभी शान शौकत से
पटाखें बर्बादी का कारण हैं
आना चाहिए हर आदमी के ब्यान से
हम मिलकर ऐसे मनाये त्यौहार कि उनका भी हो सके सत्कार और सम्मान
जो वर्षों की  बाट जोहकर कि नहीं कर पाते अपना उल्लहास और अनुराग
ना सोचे पर के लिए पर करले अपना प्रीती और उपकार
खुद ही करो इसकी शुरुआत तो होगा सबका उद्धार .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड  भोपाल 462026  मोबाइल  ०९४२५००६७५३

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