जैन मुनि के तृणस्पर्श परिषहजय – विद्या वाचस्पति–डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

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जैन मुनियों की श्रेष्ठता इस बात पर निर्भर रहती हैं की जब से दीक्षित हुए उसके बाद पूर्ण स्वंत्रत होते हैं। उनके पास मात्र पिच्ची कमंडल के अलावा कुछ नहीं होता। वे दिन में पैदल ही विहार करते हैं ,उस दौरान न कोई वाहन,साधन, बस पद- विहार। उस दौरान यदि कंकड़ पत्थर से आदि से कोई वस्तु संपर्क में भी आ जाये तो उसे समता भाव से सहन करना।
जैन मुनि अपने शरीर से ममत्व त्याग कर देने वाले जो अपने पापों का नाश करने के लिए मन ,वचन और काय की शुद्धता पूर्वक वायु से उड़कर आये हुए सूखे पत्ते या तृण आदि के स्पर्श से उतपन्न हुई खुजली आदि के विकार को सहन करते हैं,उसमे किसी प्रकार का क्लेश नहीं करते उसको तृण स्पर्श परिषहजय कहते हैं। तृणादि के निमित्त से वेदना के होने पर भी मन का निश्चल रहना उसमे दुःख नहीं मानना तृणस्पर्श परीषहजय है।
जहाँ कही ऊँची नीची पृथ्वी पर सोने वाले मुनिराज के शुष्कभूमि ,तृण, पत्र ,कंटक ,काष्ठफलक और शिलातल आदि किसी भी प्रासुक असंस्कृत आधार पर व्याधि ,मार्गश्रम ,शीट-उष्ण आदि के कारण उतपन्न क्लम ९थकावट ० को दूर करने के लिए शय्या व आसन आदि लगाने पर तृणादि के द्वारा शरीर में बढ़ा उतपन्न होने पर तृणस्पर्श परिषह आता हैं। सुखा तिनका ,कठोर पत्थर ,कंकड़ ,तीक्ष्ण मिटटी और शूल आदि के विधने से पैरों में वेदना पर मुनिराज तृणस्पर्श परिषह उतपन्न होता हैं।
त्याग तपस्या करने वाले , पैदल ही चलते।
पद विहार करने वालों के ,पग तलवा छिलत।।
मोक्ष मार्ग आस्था का रास्ता हैं ,मोक्ष मार्ग पर यदि राहगीर को श्रद्धा नहीं तब मोक्ष मार्ग सुखप्रद नहीं हो सकता हैं ,प्रभु आपका मार्ग आपके प्रति श्रद्धा रखने वालों को सुखप्रद हो सकता हैं। संसारी प्राणी मोक्ष से नहीं डरता मोक्ष हर जीव प्राप्त करना चाहता हैं परन्तु मार्ग सुनकर के डर लगता हैं कि मोक्ष मार्ग बहुत कठिन हैं ,उस मार्ग की कठिनाइयों को सुनकर के विचलित हो जाते हैं। जो कठिनाईओं से डरते वे जगत में कायर पुरुष कहलाते हैं वीर पुरुष नहीं। मुनि महाराज सोचते हैं की तलवार की परीक्षा म्यान में नहीं मैदान में होती हैं। साधु का जीवन तपस्या के लिए होता हैं ,त्याग के लिए होता हैं। साधू त्याग पूर्वक ही बना जाता हैं। त्याग के साथ तपस्या और तपस्या के साथ त्याग अनिवार्य हैं। सांसरिक क्रियायों की अंतिम विदाई का नाम दीक्षा। समस्त मूलाचार को स्वीकार करने का नाम मुनि दीक्षा हैं। सुख में तप नहीं होता परन्तु तप से सुख जरूर होता हैं। कष्ट में दीक्षा नहीं होती परन्तु दीक्षा में कष्ट नहीं होता दुःख में तप नहीं होता। हर एक कष्ट ,सुख की सूचना देते हैं। जितना सुख चाहो उतना कष्ट सहो। मुनिराज सब जीतते ही जीतते हैं वे किसी से हारते नहीं। जो इन्द्रियों को जीत लेता हैं वह सदा जीतता ही जीतता हार उसके सामने आती ही नहीं। हार भी मुनि से हार जाती हैं। जब चलते चलते समय कभी उष्ण काल में पग तलवा जलते हैं तब नरक की असीम वेदना का विचार करते हैं ,जब पैरों से लहू बहता हैं तब नरक का विचार करते हैं ,जब पग तलवा छील जाते हैं तब विचार करते हैं ओ हो नरक में तो सारे शरीर की सारे शरीर की चमड़ी को केले की तरह ,लौकी की तरह ,आलू की तरह छील दिया गया तब का तो विचआर करो ,उस दुःख की अपेक्षा तो यह कुछ भी नहीं हैं। नरक का कष्ट तो कर्म बंध का कारण था परन्तु यह कष्ट जो संयम के साथ हैं वह कर्म निर्जरा का कारण हैं।
कभी बबूल के कांटे ,देखो पैरों में चुभते।
पड़े मार्ग में पैने कंकर , पैरों में चुभते।।
मुनिराज वर्षा योग में चार माह एक जगह रहते हैं ,गमन नहीं करते। बाकी शीतकाल में ग्रीष्मकाल में ,समयानुसार विहार करते हैं मुनिराज पदबिहारी होते सदा पद विहार करते हैं। सभी मार्ग पर समता भाव से आगे बढ़ते जाते हैं। हमेशा मार्ग देखकर के चलते फिर भी कभी- कभी काँटा लग जाता हैं। काँटा लगने से रकर निकल आता हैं घाव बन जाता कईबार सही उपचार नहीं होने पर विकराल रूप ले लेता हैं। बड़ा घाव बन जाता हैं। मवाद बनने लगता हैं जिससे अपार पीड़ा को सहन करते हैं। तकलीफ होने पर रंस्पर्श परिषह का विचार करते हैं। कभी- कभी कांच लग जाता हैं ,लोहा लग जाता हैं ,पत्थर लग जाता हैं ,लकड़ी लग जाती हैं ,बारीक -बारीक कंकरों का चुभन भी तृणस्पर्श में आता हैं।
जैसे सुवर्ण अग्नि से तृप्त हुआ भी अपने स्वर्णपन को नहीं छोड़ता हैं उसी तरह ज्ञानी कर्मों के उदय से तप्तायमान हुआ भी ज्ञानीपने के स्वभाव को नहीं छोड़ता। इस प्रकार से ज्ञानी अपने लीन रहता हैं ,तभी उपसर्ग और परीषहों को सहने में कामयाब हो जाता हैं। विपत्ति के समय में ज्ञान ही काम आता हैं जो सहस प्रदान करता हैं।
तृणस्पर्श कभी हो जाता, अकबकाई लगती।
पैरों में छाले आ जाते ,ऊँची नीची धरती।।
मुनिराज का जीवन दया मय होता हैं ,जिनका जीवन करुणामय हृदय होता हैं अहिंसा मय साँसे होती हैं। मुनिराज प्रत्येक पीड़ा को सहते हैं परन्तु वे किसी को कष्ट देने वाले के परती वात्सल्य का भाव रखते हैं। जो साधु सुख के समय मुस्कराता नहीं हैंऔर दुखके समय रोता नहीं वह सच्चा साधु होता हैं। कष्ट सहने वाले की अपेक्षा कष्ट देने वाला अधिक कष्ट को पाता हैं। कष्ट देने वाला नरक में जाता हैं और कष्ट सहने वाला स्वर्ग या मोक्ष को जाता हैं । ध्यान रखना चाहिए जो हिंसा की प्रशंसा करना महाहिंसा होती हैं।
सूखे पत्ते आदि के स्पर्श हो जाने पर या कोई ऐसी स्थिति बन जाए जिससे उन्हें असहनीय वेदना को सहन करना पड़े या पैरों में चलते चलते छाले ,फोड़ा आदि भी पड़ जाते हैं या पड़ जाए तो भी संयत भाव रखते हैं। कभी कभी ऊँची नीची जमीन पर मिलने पर भी अपने भावों में समता भाव रखते हैं। इस प्रकार मुनिराज समता भाव की प्रतिमूर्ति रहते हुए कष्टों को कष्ट नहीं मानते।
कर्म निर्जरा करने हेतु ,मौन धरा करते।
तृण परिषह को सहने वाले,सिद्ध हुआ करते।।
चारित्र धारण करने वाले पुरुष समता भाव करते ,समता भाव के बिना चारित्र में पवित्रता नहीं आती। विशुद्धता हैं विशुद्धता के कारण यह जीव हिंसा आदि पापों से बच जाते हैं। समता भाव के बिना कर्मों की निर्जरा नहीं होती। कर्म निर्जरा के लिए साधक समस्त प्रकार से मौन धारण करते हैं। साधु किस लिए मौन धारण करते हैं ?कटु शब्द कहने में न आ जाये ,असत्य का भाषण न हो जाये ,मेरे शब्दों से किसी का अहित न हो जाए इस कारण अधिक से अधिक समय मौन धारण करते हैं। हितकारी वचन बोलने में नहीं , मुनिराज रात्री के समय पूर्ण मौन धारण करते हैं ,आहार के समय मौन धारण करते हैं ,लघुशंका ,दीर्घशंका के समय मौन धारण करते हैं ,उपसर्ग के समय मौन धारण करते हैं ,दो के बीच बिना प्रयोजन नहीं बोलते हैं। आवश्यकता होने पर चुप भी नहीं रहते।
मुनिराज हेय/अप्रिय वचन नहीं बोलते ,हेय वचनों को हेय जान करके छोड़ देते हैं। मौन धारण करने से वचन की सिद्धि होती हैं ,वाक्य की शुद्धि होती हैं अनावश्यक बोलने से बचते हैं ,वचन गुप्ति की साधना के लिए अनेक कारणों के साथ कर्म की निर्जरा के निम्मित मौन रहते हैं।दीन बन करके मुनि बनना और मुनि बन करके दीन नहीं बनना ।
इस प्रकार तृणस्पर्शजय परिषह को मौन से जीतते हैं।
विद्या वाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन, संरक्षक शाकाहार परिषद्A2/104 पेसिफिक ब्लू, नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड ,भोपाल 462026 मोबाइल 9425006753

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