जैन तीर्थोद्धारक बाबूजी

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महावीर दीपचंद जी ठोले, छत्रपती संभाजीनगर, महामंत्री श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा महाराष्ट्र प्रांत मो-75880 44495
जिनका नाम निर्मल ,आचार निर्मल, विचार निर्मल, व्यक्तित्व निर्मल, स्वभाव निर्मल, भावना निर्मल, सिद्धांत निर्मल, वकृत्व निर्मल, कृतित्व निर्मल, दायित्व निर्मल, ऐसे जैन संस्कृति के ऊनायक, महासभा के महानायक, स्वर्गीय निर्मल कुमार जी सेठी (जैन) आज निश्चित हमारे बीच नहीं है परंतु मेरा मानना है कि भव्यात्मा की कभी मौत ही नहीं होती। वह अजरामर ही रहता है ।क्योंकि क्या मार सकेगी मौत उसे जो रोतो के आंसू पीता है।
ऐसे आदरणीय निर्मल कुमार जी के बारे में कह सकते हैं कि कठिन परिश्रम और लगन को जिसने गुरु बनाया, रखा यही आदर्श जब भी कोई कदम उठाया ।इसीलिए तो मरने पर भी जिनकी हो रही है पूजा, बीत जाएगी सदिया पर भाव ना होगा दूजा।। ऐसे बाबूजी की महानता लिखने की क्षमता से परे है। आपका कृतित्व एवं व्यक्तित्व महिमातीत, तर्कातीत, शब्दातीत, वर्णनातीत है ।आप आचरण में दृढ़,पद लोलुपतासे दूर, समाज के हित चिंतक, शिक्षा के उत्थान के लिए पूर्ण समर्पित ,नारी जाति के कल्याण के लिए सदैव तत्पर ,बच्चों में जिन धर्म संस्कार डालने हेतु अग्रणी, विदेशो में जैन धर्म के अस्तित्व की खोज करने हेतु अन्वेषक, साधु संतों की सेवा के लिए दिन-रात उद्दत, जिनवाणी के प्रकाशन हेतु चेष्टारत, पांडुलिपि के संरक्षण के लिए अग्रणी, तीर्थ के जीर्णोद्धार को जीवन का प्रमुख उद्देश्य मानने वाले, युवकों में ओजस्व भरने वाले, समाज की राजनैतिक चेतना के प्रमुख मसीहा, समस्त विश्व का भ्रमण करके जैन धर्म का अलख जगाने वाले रमता योगी,निस्पृही, घर में रहकर भी भरतकी तरह बैरागी ,हिमालय की तरह सिद्धांतों पर अडिग, गंगा की तरह निर्मल मन वाले महामानव ,युग पुरुष भीष्म पितामह ,जैन सरस्वती के उन्नायक थे ।
बाबूजी ने समाज के सभी विषयों पर सूझ -बुझ का परिचय दिया था। यद्यपि बाबूजी त्यागी और निस्पृही थे फिर भी वैभव आपके चरणों में लौटता रहा।
श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा की आपने 40 वर्षों तक निस्वार्थ ,अथक सेवा की ।आपके नेतृत्व में महासभा का चतुर्दिक विकास हुआ ।आप दिगंबर जैन संस्कृति के ,पुरातत्व के, समाज के सुरक्षा एवं विकास में पागल की तरह जुटे रहते थे। आप जैन पुरातत्व के रक्षक लोह पुरुष थे।
बाबूजी निर्मलजी सेठी ने भारत के अनेक तीर्थो का स्वयं अपनी देखरेख में, स्वयं के द्रव्य से जीर्णोद्धार तो किया ही है ,ईसके बावजुद आपने तीर्थ संरक्षिणी महासभा के माध्यम से कम से कम 600 प्राचीन तीर्थो का जीर्णोध्दार भी किया है। आपके नेतृत्व में तीर्थ संरक्षिणी महासभा ने जो रचनात्मक कार्य किए वे सदा स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेंगे। इतना ही नहीं आपने विदेश में कंबोडिया, व्हिएतनाम , इंडोनेशिया, इथियोपिया, मेक्सिको, गुआटे माला, पेरू ,कन्या, श्रीलंका आदि देशों में जाकर हजारो वर्ष पुर्व जैन पुरातत्व , जैन धर्म , प्राचीन विज्ञान और आध्यात्मिकता में कितना समृद्ध है। इसकी जानकारी विश्व को मिल सके इसके लिए सतत प्रयत्न शील थे। जैनत्व की, जैन पुरातत्व ,व उसकी विश्व व्यापी प्राचीन ता, संस्कृती को विश्व पटल के समक्ष लाने के लिए पागल की तरह पुलकित हो उठते थे।ईसीलिए आपको जैन तीर्थोद्धारक के रूप में सम्बोधा जाता है । ऐसे अहर्निश समाज और संस्कृति के उत्थान के कार्य करने वालाअद्भुत व्यक्ति अब होना दुर्लभ है।
आपका कहना था की टूटे मन से कोई खड़ा नहीं हो सकता और छोटे दिल से कोई बड़ा नहीं बन सकता इसलिए वह जो भी कार्य करते थे बड़े मन से और खुले दिल से करते थे। इसलिए उसमें सफलता मिलती थी। आपसे हमें सार्थक जीवन जीने की कला सीखने को मिलती है ।बाबूजी शांति के अग्रदूत थे। आपके पास जीवन के गंभीर अनुभवों का खजाना था ।इसी अनुभवो के आधार पर आपने अपने जीवन शैली को रचनात्मक बनाया था ।
ऐसे जिसकी सोच में आत्मविश्वास की महक थी, जिनके इरादों में हौसलों की मिठास थी, जिसके नियत में सच्चाई का स्वाद था, जिसकी पूरी जिंदगी महकता हुआ गुलाब था के तृतीय स्मृति दिवस के अवसर पर मै अभिवादन करता हूं। उनसे हम यही प्रेरणा ले सकते हैं कि कदम ऐसे चलो की निशान बन जाए। काम ऐसे करो की पहचान बन जाए। यूं तो जीवन जी लेते हैं सभी लोग इस जगत में, पर जीवन ऐसा जियो की बाबूजी जैसी मिसाल बन जाए। इसी भावना के साथ महाराष्ट्र प्रांत तीर्थ संरक्षिणी महासभा की ओर से बाबूजी के तृतीय पुण्यतिथि पर भावभीनी विनयान्जली।
आ संपादक महोदय, जयजिनेद्र, बाबूजी निर्मल कुमार जी सेठी के तृतीय स्मृति दिवस के निमित्त यह आलेख पत्रिका मे प्रकाशित कर उपकृत करे धन्यवाद।
महावीर ठोले छत्रपती संभाजीनगर, (महा)
7588044495

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