जैन समाज मात्र मतदाता हैं और कुछ नहीं !-कागज़ के शेर हो बस

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विगत दिनों आगरा में जैन राजनैतिक मंच का गठन हुआ और उसमे एकता देखने मिली और वह भी मुनि पुंगव श्री १०८ सुधासागर जी महाराज के कुशल संयोजन में .यह शुभ संकेत हैं .इसमें जो भी विषय के साथ प्रस्ताव पारित हुआ की हमें देश /प्रदेश /स्थानीय स्तर राजनीति में सक्रीय भाग लेना हैं .हम किसी भी राजनैतिक पार्टी की कृपा पर जिन्दा नहीं हैं ,हम पर पार्टी निर्भर हो .यह सही हैं हम संख्याबल में कम हैं पर हम किसी भी पार्टी को हरा -जिता सकते हैं .
सरकारे जब किसी समुदाय की बात को गंभीरता से नहीं लेती और जैन समाज के श्रेष्ठ आचार्य मुनियो को पंच परमेष्ठी मानकर पूजते हैं ,उनके द्वारा श्री सम्मेद शिखर जी की आन , बान ,शान के लिए अपने प्राण न्योछवर कर दिए उसके बाद भी बहरी सरकारों के कान में जू नहीं रेंग रही इसका आशय साफ़ हैं की सरकारे जैन समाज को मात्र मतदाता मानकर उसका दोहन करती हैं .
आज जैन समाज को इस बात का अहसास हो गया हैं कि जब तक हमारा राजनैतिक पहलु मजबूत नहीं होगा तब तक हमारी कोई भी बात नहीं सुनी जायेगी .रहा सवाल राजनीति का तो हमारी समाज में वर्तमान में सैकड़ों अखिल भारतीय स्तर के संघ हैं और सब अपने आपको मठाधीश मानते हैं और कुछ विश्व स्तर के हैं .बहुत अच्छी बात हैं .क्या वे सब आपस में मिलकर बैठते हैं ,बात करते हैं ,कोई किसी से कम नहीं हैं .बातों में बहुत उदारता होती हैं और पद के लिए खून के प्यासे रहते हैं .
जब तक सब संघ के मठाधीश आपस में मिलकर बैठे ,एक दूसरे के भावों को आदर दे और आँतरिक और बाह्य भाव से एक हो तो बहुत कुछ समस्याओं का समाधान निकल पायेगा अन्यथा हमारी जैन समाज की संस्कृति केकड़ा संस्कृति हैं एक दूसरे की टांग पकड़े दूसरे को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं .सब लोग पद ,प्रतिष्ठा , प्रदर्शन के पीछे पड़े हुए हैं .
राजनैतिक पार्टियां हमे आपस में लड़ा कर मजा लेती हैं .जैसे कोई एक पार्टी से चुनाव लड़ता हैं दूसरी पार्टी के लोग अपनी समाज के ही व्यक्ति को उसके विरुद्ध में खड़ा कर तीसरे को जितवादेते हैं ,इस हथकंडे से बचना होगा .
हम थोड़े जरूर हैं पर मजबूत और संगठित हो ,संख्या बल की जगह गुणवत्ता वाले रहे .इस समय त्याग का भाव रखे तथा स्थानीय प्रदेशेषिक के साथ राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाये और ऐसा स्थान बनाये जो महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में माना जाए .
इस समय हमें अपने उपनामों का मोह भी त्यागे जैसे खंडेलवाल ,सिंघई ,भारिल्ल आदि जो भी हों उनकी जगह मात्र जैन बोले और लिखे .इसके साथ अपने दिल में विशालता लाये .आजकल गांव छोड़कर शहरी क्षेत्रो में रहने से वहां के मंदिरो और घरों की देखभाल करने वाले नहीं बचते हैं ऐसे में जो पुजारी का कार्य करना चाहते हैं उन्हें सम्मानीय राशि देकर अपने निजी निवासों को फ्री में दे और वे लोग व्यापार करना चाहे तो उनको दुकान के लिए जगह दे जिससे एक परिवार का संरक्षण के साथ मंदिरों की देखरेख होगी .और उनके घरों की साफ़ सफाई देखरेख होती रहेंगी .
जैसे अन्य समाज में दिन में पांच बार पूजा स्थल में मिलते हैं वैसे ही समाज के लोग स्थानीय अवकाश को एक साथ बहुतायत से बैठकर सामाजिक ,राजनैतिक धार्मिक पहलुओं पर चर्चा करे .आपस में मिलकर बैठने से बहुत से मनोविकार .गलतफहमियां दूर होकर एकता का भाव आएगा . इसके साथ सांयकालीन पाठशालाओं का चलन फिर से शुरू करना होगा जिससे बाल्यकाल से ही उनमे संगठन बनाने का भाव आएंगे .
आज समाज को राजनीतिक पार्टियां एवं सरकारें मात्र मतदाता मानते हैं .अब हमें मत —दाता
न बनकर हमको मत का महत्व बताना होगा .अन्यथा अभी दो साधुओं का बलिदान हुआ हैं वैसे हम लोग भी मरेंगे और कोई अपनी बात नहीं मानेगा .इस समय की जरुरत हैं हमें भी राजनैतिक एकता की जरुरत हैं और आचार्य श्री द्वारा शुरू की गयी प्रशासनिक सेवाओं में आकर भी निर्णय हेतु सक्षम होगा .
यह समय समाज के मठाधीशों के आत्मअवलोकन का हैं .जिसे नकारना नहीं हैं .अभी कुछ बिगड़ा नहीं हैं पर ऐसी लापरवाही भविष्य के लिए हानिकारक होगी .
क्षत्रि हो तो क्षत्रिय धरम अपनाओ
कायरता हैं सीखी तो कायर बन जाओ .
जितना धन कमा रहे हो और मंदिर बना रहे हो
वे अन्य समुदाय के काम आएँगी
हमारा वंश ,जाति ,कुल, समाज ढूंढते रह जाओगे .
कम हैं पर गुणवत्ता वान बनो
कागज़ के शेर की अपेक्षा मुर्दा अच्छे
कम से कम गिनती में आओगे और
उतने कम मतदाता बन जाओगे .
सरकार को तुमसे मतलब नहीं तो क्यों
बढ़ा रहे हो कागज़ों में अपना अस्तित्व .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५३

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