जैन परंपरा में राम और रामकथा : एक दृष्टि

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अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा की चर्चा दुनियाभर में हो रही है। पूरा देश का पूरा वातावरण इन दिनों राममय है। इसके साथ ही रामकथा और भगवान को लेकर विभिन्न धर्मग्रंथों में लिखी गईं बातों को लेकर भी चर्चा हो रही है।
मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र इतने अधिक लोकप्रिय हुए हैं कि उनका वर्णन न केवल भारतीय साहित्य में हुआ है अपितु भारतेतर देशों के साहित्य में भी सम्मान के साथ हुआ है। भारतीय साहित्य में जैन, वैदिक और बौद्ध साहित्य में भी वह समान रूप से उपलब्ध है।
रामकथा जन आस्था का केन्द्र : पुराण और इतिहास की सीमाओं को लाँघकर ‘राम’ और उनकी ‘रामकथा’ जन-आस्था का केंद्र बन चुकी है यह एक सर्वमान्य तथ्य है। निःसंदेह, राम का आदर्श चरित्र देश-काल की सीमाओं को तोड़कर विश्व साहित्य को भी प्रभावित करता रहा है। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश तथा हिंदी क साथ-साथ असमिया, बंगला, उड़िया, तमिल एवं कन्नड़ आदि भाषाओं के कवियों ने ‘रामकथा’ को बहुत आदर एवं निष्ठा के साथ ग्रहण करके युगानुरूप अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। जैन धर्मावलंबी कवियों , रचनाकारों ने ‘रामकथा’ को अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ ग्रहण करके धर्म एवं दर्शन के साथ-साथ जैन समाज एवं संस्कृति की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया है।
जैनधर्म के लिए भी खास है अयोध्या :अयोध्या आज राम भगवान की प्राण प्रतिष्ठा के कारण दुनिया में सबकी जुबान पर है, चारों ओर अयोध्या और राम नाम की चर्चा है , आपको पता होना चाहिए कि अयोध्या का जैन धर्म से भी  खास संबंध है। जैन परंपरा के अनुसार, 24 तीर्थकरों में से पांच का जन्म अयोध्या में हुआ। जिनमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ), जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा,  अजितनाथ, अभिनंदन नाथ, सुमित नाथ और अनंतनाथ शामिल हैं। यही नहीं, अयोध्‍या में मौजूद जैन मंदिर भी संबंधों की मजबूत कड़ी की गवाही देते हैं। पांच तीर्थंकर भगवंतों की जन्मभूमि अयोध्या में  समय-समय पर इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से देखा जाय तो खुदाई  से प्राचीन श्रमण परंपरा यानि जैनधर्म के अवशेष प्राप्त होते  रहे हैं।
जैन परंपरा में पद्म के नाम से भी जाने जाते हैं भगवान राम : जैनाचार्यों ने रामकथा पर अनेक चरित और पुराणों की रचना की है। इनमें सातवीं शताब्दी में हुए प्रमुख जैनाचार्य रविषेण ने संस्कृत भाषा में पदमपुराण नामक पौराणिक श्रेष्ठ चरितकाव्य की रचना की है। जैन परंपरा में राम का एक नाम पद्म भी है, इसलिए जैन परंपरा में राम की कथा पद्म नाम से ज्यादा मिलती है। पद्मपुराण ग्रंथ में बताया गया है कि राम कथा का स्मरण मात्र पापों का नाश करता है। विघ्नों,  संकटों के बीच अद्भुत समता प्रदान कर आत्महित सर्वोपरि की शिक्षा देता है।
रामकथा की विश्वव्यापी जनप्रियता के कारण विश्व के सम्पूर्ण कथा साहित्य का अर्द्धाधिक भाग परम पुण्यात्मा रामकथा पर अवलम्बित, सम्बद्ध है। हिन्दी, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत, कन्नड़, तमिल, मलयालम आदि अनेक भाषाओं के कवियों ने इनके चरित पर लेखनी चलाकर स्वयं को धन्य अनुभव किया है।
पद्मपुराण के प्रमुख पात्र और उनकी वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता पद्मपुराण की प्रासंगिकता असंदिग्ध है। राम, लक्ष्मण, भरत और सीता आज भी भारतीय / वैश्विक जनमानस में श्रद्धा के पात्र बने हुए हैं।
जैन परंपरा में राम : जैन परंपरा में तिरेसठ अतिशय पुण्यवान पुरुषों को शलाका पुरुष माना जाता है। ये संसार का कल्याण एक ही करते हैं अपनी उग्र साधना से भव में या आगामी भवों में मुक्तिराम का वर्णन करते हैं। भगवान राम उन तिरेसठ शलाका में (नव नारायण, नव बलभद्र, द्वादश चक्रविद्या एवं चतुर्विंशति तीर्थंकर) में अष्टम् भद्र बल माने जाते हैं। बलभद्र राम बीसवें तीर्थकर मुनिसुव्रतनाथ भगवान के तीर्थकाल में हुए हैं। मूल रूप से इस पुराण भगवान मुनिसुव्रतनाथ के चरित्र का वर्णन भी मिलता है। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, पिता के आज्ञानुवर्ती हैं, आदर्श भ्राता हैं, जिससे भरत का राज्य वृद्धिगन्त होता रहे , इस भावना से वनवास करना श्रेयस्कर मानते हैं। पद्मपुराण के अनुसार- हमारे स्वामी राम महापुरुष हैं वे अधर्म में प्रवृत्त नहीं होंगे- “महानुभावधीर्देवो निधर्मे न प्रवर्तते।”-प.पु. 70/11
श्रीराम ने भी जैनधर्मानुसार दीक्षित होकर मांगीतुंगी पर्वत पर तप किया और मुक्ति को प्राप्त हुए। ज्ञातव्य है कि मांगीतुंगी पर्वत (जो वर्तमान में महाराष्ट्र प्रान्त में स्थित है) के दो शिखर हैं, एक का नाम मांगी और दूसरी का नाम तुंगी है। मांगी शिखर पर सीता ने तपस्या की और तुंगी शिखर पर राम, हनुमान, सुग्रीव आदि ने तपश्चरण करके मुक्ति को प्राप्त किया।
आज की राजनीति के लिए राम का आदर्श उदाहरण :  राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, हनुमान आज भी जनमानस में श्रद्धा के पात्र बने हुए हैं। आज की राजनीति के लिए भगवान राम का राजपाठ छोड़कर जाना एक आदर्श उदाहरण है। पतिव्रता नारी के रूप में सीता से बड़ा कोई उदाहरण नहीं है।
रिश्तों की पवित्र कहानी : हमें पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक वातावरण सुधारना है तो रामायण जरूर पढ़ें। हर घर में रामायण  होना चाहिए। रामायण रिश्तों की एक पवित्र कहानी है। राम मानवता की जीवंत मूर्ति हैं।  जहाँ रामायण होगी उन घरों में महाभारत नहीं होगी। जैन रामायण में एक जगह यह बताया गया है कि लंका के राजा रावण का वध राम ने नहीं लक्ष्मण ने किया था। जैन रामायण दार्शनिक स्तर पर अन्य रामायणों से बहुत अलग है।
पौराणिक पद्मपुराण का यह कथन सत्य है कि- “महतां पुरूषानां च चरितं पापनाशनम्” (3/29) अर्थात महापुरुषों के चरित्र चित्रण पापों को नष्ट करने वाला होता है, मूलतः उनका चरित्र सिद्धांत होना चाहिए।
पद्मपुराण (जैन रामायण) के सारे चरित्र अपने धर्म का पालन करते हैं। राम एक आदर्श पुत्र हैं। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है। पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं। विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।
सीता का पातिव्रत महान है। सारे वैभव और ऐश्वर्य को ठुकरा कर वे पति के साथ वन चली गईं।
रामायण भातृ-प्रेम का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ बड़े भाई के प्रेम के कारण लक्ष्मण उनके साथ वन चले जाते हैं वहीं भरत अयोध्या की राज गद्दी पर, बड़े भाई का अधिकार होने के कारण, स्वयं न बैठ कर राम की पादुका को प्रतिष्ठित कर देते हैं। रावण के चरित्र से सीख मिलती है कि अहंकार नाश का कारण होता है।
राम भारतीय संस्कृति की ऊर्जा का अक्षुण्ण स्रोत हैं। राम अस्तित्व व सभ्यता की धुरी हैं, आज जरूरत है उनको अंतस में उतारने की।

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