जैन परम्परा में पर्यावरण चिंतन’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

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भगवान महावीर के 2550 वे निर्वाणोत्सव , जैन अनुशीलन केंद्र राजस्थान विश्वविधालय के 50 वे स्थापना वर्ष एवं श्री हरि सिंहजी रांका की स्मृति में “जैन परम्परा में पर्यावरण चिंतन ” विषय पर जैन अनुशीलन केंद्र राजस्थान विश्वविधालय द्वारा “राष्ट्रीय संगोष्ठि “आयोजित की गई।
संगोष्ठी का उद्वघाटन सत्र प्रातः 10 बजे हुआ जिसकी अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. अल्पना कटेजा द्वारा की गई। मुख्य अतिथि के रूप माननीय न्यायमुर्ति नगेन्द्र कुमार जैन पूर्व मुख्य न्यायधीश मद्रास व कर्नाटक उच्च न्यायालय व मुख्य वक्ता प्रो.वीरसागर जैन,जैन दर्शन विभागाध्यक्ष ,लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविधालय नई दिल्ली रहे। विशिष्ट अतिथि श्रीमती नीना कमल रांका,ट्रस्टी मीना रांका फैमिली फाउंडेशन रही। उद्वघाटन सत्र के प्रारंभ में जैन अनुशीलन केंद्र की निदेशक प्रो.रश्मि जैन ने अपने स्वागत उद्बोधन में जैन अनुशीलन केंद्र के गौरवशाली इतिहास को बताते हुए ,तीर्थकर भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए शुभकामनाऐं प्रेषित की ।
आयोजन सचिव रोहित कुमार जैन द्वारा इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की प्रस्तावना में बताया कि इस तरह की संगोष्ठी का उद्देश्य जैन परंपरा में वर्णित पर्यावरणीय चेतना को सामुदायिक चेतना में रूपांतरित करना जिससे यह विमर्श वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में सहायक होगा एवं संपोषणीय विकास का मार्ग प्रशस्त करने में कारगर होगा।
मुख्य वक्ता प्रो वीरसागर जैन ने बताया कि जैन धर्म का प्रमुख संदेश अहिंसा परमो धर्म: है लेकिन आज पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं को देखते हुए इसे पर्यावरण सरक्षंण परमो धर्म का नारा बुलंद करना चाहिए यह समय की महत्ती आवश्यकता है। जस्टिस एन के जैन ने अपने उद्बोधन में बताया की हमे प्रकर्ति संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।प्रो. अल्पना कटेजा माननीय कुलपति राजस्थान विश्वविधलाय ने अपने उद्बोधन में बताया कि आज पर्यावरण की समस्या वैश्विक समस्या है जिस पर सामूहिक सामुदायिक चिंतन आवश्यक है।इस अवसर पर जैन अनुशीलन केंद्र के पूर्व निदेशक प्रो.अनिलजैन,प्रो.पी सी जैन ,प्रो.संजीव भानावत जी का जैन अनुशीलन केंद्र के निदेशक के रूप में अपनी सेवाएं देने के लिए सम्मान किया गया। दूसरे परिचर्चा में ख्यातिनाम विद्वान महामहोपाध्याय प्रो.दयानद भार्गव , राजस्थान प्राकृत भाषा एवं साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रो. धर्मचंद जैन जी,एमेरिटस प्रो.सुषमा सिंघवी जी,प्रो.अनिल जैन पूर्व निदेशक जैन अनुशीलन केंद्र ,प्रो.दीपक श्रीवास्तव आदि शामिल हुए जिन्होंने विभिन्न विषय जैसे जैन साहित्य में पर्यावरण संरक्षण, अपरिग्रह और पर्यावरण सरक्षण, श्रावक जीवन और पर्यावरण सरक्षंण, भारतीय संस्कृति और पर्यावरण,जैन सिद्धान्त और पर्यावरण आदि विषयों पर सार्थक परिचर्चा की। प्रो.दयाननद भार्गव ने बताया कि “धर्म पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकता है और विज्ञान पर्यावरण के प्रदूषित होने पर उसे शुद्ध होने के उपाय बताता है साथ ही बताया कि मनुष्य जाति का इतिहास ,प्रकर्ति से दूर जाने का इतिहास है और परस्पर एक दूसरे से दूर होने का भी इतिहास है।प्रो. सुषमा सिंघवी ने बताया कि समाज की सोच व्यक्ति केंद्रित के स्थान पर सृष्टि केंद्रित होनी चाहिए। प्रो. अनिल जैन ने लोक साहित्य में महाकाव्यों के विवरणों पर प्रकाश डाला और अहिंसा के रोचक उद्धरण प्रस्तुत किये।प्रो. धर्मचंद ने जीवन मे मूल्यात्मक दृष्टिकोण के महत्व को बताते हुए अपरिग्रह की अनुकरणीय व्याख्या की। सत्र संयोजक दीपक श्रीवास्तव ने जैन सिद्धान्तों की तुलना पाश्चातय पर्यावरण विचारों से करते हुए भारतीय पर्यावरण दृष्टिकोण को सर्वग्राही और सुसंगत बताया। इस सत्र में प्रतिभागियों में अनेक प्रश्न पूछे जिनका समाधान चर्चा में शामिल विद्वानों द्वारा किया गया। परिचर्चा सत्र के अंत मे प्रो.रश्मि जैन द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया है।
अंतिम सत्र तकनीकी की अध्यक्षता प्रो.पी सी जैन द्वारा की गई द्वारा की गई जिसमे अतिथि वक्ता के रूप में डॉ.बिपिन दोषी मुम्बई शामिल हुए। इस सत्र में देश भर से आये शोधार्थी,विद्वतजनों ने पत्रवाचन किया ।इस संगोष्टि मे देश के अनेक हिस्सों से प्रमुख गणमान्य जन पधारे जिनमें कमल रांका मुम्बई,रांकाफाउंडेशन,समाजसेवी डॉ.बिपिन दोषी,डॉ.अनिल जैन ,आर सी जैन निदेशक विधाआश्रम,ताराचंद जैन निर्देशक पर्ल ग्रुप , परमात्मप्रकाश भरिल्ल, अशोक जैन,महेश जैन ,डॉ हेमन्त सेठिया, महेश जैन ,मनीष मेहता, डॉ जिनेश जैन , सुरेन्द्र बज, अशोक जैन पल्लीवाल, उदयभान जैन कमल बाबू जैन महेंद्र बैराठी सुरेंद्र प्रकाश जैन प्रो. विधा जैन, प्रो.आई .पी जैन,प्रो समेत समस्त देश भर से पर्यावरण मामलों ,जैन दर्शन एवं जैन धर्म के विशेषज्ञ शामिल हुए।

राजाबाबु गोधा जैन गजट संवाददाता राजस्थान

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