गरबा नृत्य में गर्भा बनते देर नहीं लगती ! कितना शिष्ट या अशिष्ट होता हैं ?

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मुंबई अहमदाबाद बड़ोदरा आदि महानगरों में होने वाले गरबा नृत्य के दौरान और बाद में बड़ी अटपटी और दिल दहलाने वाली खबरों पिछले वर्षों में सुनाई पडी थी जिस कारण वहां के शासन प्रशासन ने समय सीमा निर्धारित की थी और की जाती हैं पर घटनाओं को कोई रोक नहीं सकता .
हर व्यक्ति को अपनी अपनी स्थिति मान्यता के अनुसार इबादत पूजा प्रार्थना करने का मौलिक अधिकार हैं और होना भी चाहिए .वर्तमान में जो नवरात्री में गरबा का कार्यक्रम होता हैं वह बहुत मनोरंजक और श्रमसाध्य होता हैं क्योकि इस में एकाग्रता के साथ तालमेल का होना अनिवार्य होता हैं .इसके लिए औसतन १५ दिन से लेकर एकमाह का अनवरत प्रयास अभ्यास होता हैं जिसका प्रतिफल देखने मिलता हैं . हर सुंदरता के पीछे कुरूपता छुपी होती हैं .आजकल इसमें नवधनाढ्य के साथ आर्थिक सम्पन्नता के साथ आधुनिक एवं पाश्चातय संस्कृति का प्रचलन होने से इसके दुष्प्रभाव देखने भी मिलते हैं .इन आयोजनों अधिकतर नवयुवक और नवयुवतियां की भागीदारी अधिकांश होती हैं और इस दौरान भड़कीले और पारदर्शी परिधान में महिलायें आकर्षक और आकर्षण का केंद्र होती हैं और नवयुवक भी बढ़चढ़ का अपना प्रभाव दिखाने में भी कमी नहीं रखते .जो स्वाभाविक होता हैं .यहाँ तक कोई किसी को कोई कष्ट नहीं हैं पर जब लगातार नियमित नवयुवक और नवयुवती के मिलने से आकर्षण होने के कारण जब पहचान अंतरंगता में बदल जाती हैं और जब ये भागकर कुछ अनैतिक कार्य करते हैं या हो जाता हैं तब वह गरबा गर्भ में बदल जाता हैं तब उसका प्रतिफल युवतियों को भोगना होता या पड़ता हैं .
आजकल पश्चिमी संस्कृति के हवा से कोई नहीं बच पा रहा हैं ,आजकल नशा करने का चलन बहुत हैं और मस्ती में सब मर्यादा खत्म हो जाती हैं और उसके दुष्परिणाम युवतियों को अधिकतम भोगना पड़ता हैं .आज का युवा वर्ग तर्कमें अधिक विश्वास करता हैं .जोश में होश नहीं होता और अनुभवहीनता के कारण घर के बुजुर्गों की बात असहनीय होती हैं और उनको मनमानी करना होती हैं .
जब चिड़िया चुग गयी खेत, तब पछताय का होत
मनोरंजन मर्यादा और सीमा में हो वह प्रशंसनीय हैं पर जब वह असीमित और अमर्यादित हो जाती हैं तब वह विकृति पैदा करती हैं .इन दिनों इसके दुष्परिणाम नहीं देखने मिलते पर कुछ दिनों के बाद उनकी कारगुजारियां सामने आती हैं जैसे गर्भपात के प्रकरण सामने आते हैं और कभी कभी आत्महत्या भी करने को विवश होना पड़ता हैं .और कभी कभी लड़का लड़कियों की दोस्ती के चक्कर में हत्याएं भी हो जाती हैं .देर रात्रि में नशा की हालत में दुर्घटना के भी शिकार होते हैं .
इसका उजला पक्ष यह भी हैं इससे मनोरंजन और धार्मिक वृत्ति बढ़ती हैं पर वह जब सादगी से हों जिसका वर्तमान में चलन संभव नहीं हैं .और पाश्चायत संस्कृति ने हमारे समाज में विद्रूपता बहुत होने से उसके दुष्परिणाम देखने मिल रहे हैं .सीमित और मर्यादित होना आवश्यक हैं .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५३

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