गंजपंथा जी के समाधि -स्थल की कुव्यवस्था – चिंतनीय विषय,अतिसर्वस्य वर्जयेत—मंदिरों का निर्माण -व्यवस्था अत्यावश्यक

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दिनांक १७ सितम्बर २०२३ को जैन तीर्थ क्षेत्र गजपन्था जी के समाधि स्थल पर जो स्थापित और प्रतिष्ठित मूर्त्तियों का अभिषेक जिस तरह से पदस्थ पुजारी द्वारा किया गया वह निंदनीय और चिंतनीय हैं। उक्त विडिओ के देखने के बाद लगा संभवतः जैनेतर व्यक्ति जो पुजारी /कर्मचारी कार्यरत हैं उसके द्वारा किया जाना लगता हैं और उसके द्वारा जो व्यवहार आपत्तिकर्ता के साथ किया गया क्षम्य नहीं हैं।
यह स्थिति कमोबेश अधिकांश मंदिरो ,तीर्थ क्षेत्रों के साथ गांव और कस्बों में स्थित मंदिरों में होना संभव हैं। कारण जिन स्थलो पर मंदिर आदि हैं वहां समाज शून्य जैसी हैं और वे गांव ,कस्बे खाली हो चुकेहैं। वहाँ की समाज व्यापार ,नौकरी के कारण पलायन कर चुकी हैं। कारण आर्थिक उन्नति के सहायक कारण नहीं हैं यानी पेट भर सकते हैं पर पैसे वाले नहीं बन सकते।तीर्थ स्थल,अतिशय क्षेत्रों में जहाँ की स्थिति में कम समाज हैं उन्हें अपनी आजीविका का साधन न होने से शहरों,महानगरों में बस गए। इस समय सब अभिभावक आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण अंग्रेजी माध्यमों में शिक्षित होने से वे उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं जिससे उनके बच्चे महानगरों और विदेशों जाकर बस गए और वही स्थापित हो चुके हैं। जब वहां बसावट ही नहीं होंगी और उन धरोहरों की देखरेख यानी मैनेजर ,पुजारी जैनेतर होने से उनका प्रभाव उन स्थानों पर अधिक होता हैं। वे वेतन धारक होते हैं। थोड़े समय आज्ञानुरूप चलते हैं उसके बाद उनके अनुरूप कार्य होने लगते हैं। वहां के जो ट्रस्टी /पदाधिकारी अधिकांश सम्पन्नतम लोग होते हैं उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और नाम की भूख होती हैं और उन्हें समय नहीं होता हैं क्षेत्रों की व्यवस्था और देखरेख करने के लिए।
यह स्थिति भविष्य में और दयनीय होना हैं। हमारी समाज सम्पन्न और शिक्षित होने से अनेक कुरीतियों से संलग्न हैं। गरीबी भी हैं पर पैसे वालों के कारण सामान्य जन भी सम्पन्न गिने जाते हैं। शादियों का कोई ठिकाना नहीं। अधेड़ उम्र के लड़के, लड़किया क्वारे बैठे हैं और जिनको मौका नहीं मिला या ग्रामीण शहरों के हैं वे अपनी पसंदगी की शादी करना चाहते हैं जो स्वाभाविक हैं और अधिकतर नौकरी वाले विजातीय शादी करना पसंद कर रहे हैं। और अधेड़ होने से ,परिपक्व होने से सनतानों की चाह नहीं हैं या बेमन से। अनिच्छा से या खेल खेल में पैदा हो जाने से बच्चों को डे केयर में रखते हैं। बूढ़े माँ बाप यदि पराधीन हैं या आय का स्त्रोत न होने से वे लोग तिल तिल मरते हैं और यदि आय का जरिया हैं तो वे उनके संतानों के लिए बिना पैसे के नौकर या सेवक जैसे व्यवहार पाते हैं और जब संताने स्वालम्बी हो जाती हैं तो उन्हें दूध में से मख्खी जैसा निकालकर फेंक दिया जाता हैं। यदि बूढ़े माँ बाप पैसे वाले हैं और उनकी वृध्धावस्था में यदि उनके लड़के- बहु उनको तिल तिल करके मार डालते हैं। संयुक्त परिवार की अवधारणा समाप्त होने से ये स्थितियां निर्मित हो रही हैं।
हम वर्तमान में इतने आगे बढ़ चुके हैं की पीछे लौटना मुश्किल हैं। कुछ अपवाद हो सकते हैं पर सत्य है जो कटु होता हैं।
बेमेल शादी करने वाले अधिकतर समाज से अलग थलग पड़ जाते हैं और वे भी अपने को अप्रत्यक्ष्य में हीन भावना से ग्रसित होते हैं। सामाजिक तानाबाना ख़तम हो रहा हैं और धरोहरों और मंदिरों की अधिसंख्या होने से मंदिर अधिक होंगे और दर्शनार्थी कम होंगे। और इससे अन्य शक्तिशाली/बहुसंखयक स्थानीय तौर पर समाज उन पर अनधिकृत कब्ज़ा करेंगे। मंदिरों के चिन्ह मिटाने के बाद कोई भी अपने धर्म संप्रदाय की मूर्तियां स्थापित कर वे अपना पूजा स्थल बना सकेंगे और फिर पुलिस ,वकील और कोर्ट से लड़ाई लड़ते रहो। अभी कुछ पुराणी पीढ़ी के लोग हैं जो धर्मातायनों के लिए लड़ रहे हैं। भविष्य के सम्पन्न और शिक्षितो के पास न इतना समय हैं और न इतनी रूचि।
वैसे जैन समाज का स्वर्णिम काल चल रहा हैं। आज समाज का नेतृत्व आचार्यों ,उपाध्यायों और मुनियों के हाथों में होने से दान आदि की व्यवस्था बहुत शीघ्र हो जाती हैं और आज के युग के अनुरूप जो निर्माण कार्य हो रहे हैं उनकी कालावधि कम से कम ५०० वर्षों से एक हज़ार वर्षों तक जीवंत रहेंगे ,इस दौरान नए नए मंदिरों की तीर्थ क्षेत्रों की भरमार हो रही हैं और अब तो एक एक कालोनी बहुत विस्तृत होने से कई मंदिरों का निर्माण एक क्षेत्र में होते हैं जिससे धर्म प्रभावना बढ़ी हैं यह शुभ संकेत हैं। और इस बहाने पुण्य के उदय से धन का उपयोग शुभ कार्यों में हो रहा हैं और जिनको समाज उनके व्यवसाय और आचरण के कारण कोई स्थान नहीं देता था या हैं वे धर्म के नाम पर उच्चतम दान राशि से समाज शिरोमणि कहलाने लगते हैं। पापा से अर्जित धन पुण्य के कार्यों में लगकर नवनिर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
जैसा आगम में कहा जाता हैं की जब से सृष्टि की शुरुआत हुई हैं अनादि कालीन धर्म हैं और अनंत काल तक रहेगा। बस जनसंख्या कम होने से कुछ नहीं होगा। आज गोमटगिरि इंदौर ,गिरनार जी ,कभी शिखर जी,कभी पालीताना कभी खजुराहों पर तलवार लटकी हैं और दक्षिण भारत में भी अनेकों मंदिर अन्य संप्रदाय द्वारा हथिया लिए गए और भविष्य में क्या होगा अनिश्चित हैं। अभी भी हम तिरुपति बालाजी ,बद्रीनाथ जैसे अनेक मंदिर जो जैन आम्नाय के हैं हम अपना गुणगान बखानते हैं और बस हाथ मलते रह जाते हैं।
जब तक जैन समाज में श्रावक तैयार नहीं होंगे तब तक उनकी सुरक्षा की बात करना बेमानी हैं। इस दिशा में सभी आचार्य मुनिमहाराज श्रावक संस्कार शिविर आयोजित कर जागरूकता ला रहे हैं। प्रतिभास्थली की शुरुआत स्वागत योग्य हैं और जशरम संस्कृति संस्थान आदि भी महती भूमिका निभा रहे हैं।
इस लेख में सम्पूर्ण चिंतन ,सुधार पर विचार नहीं किया जा सकता हैं। मूल समस्या का हल निकालना जरुरी हैं और गजपन्थाजैसी घटनांओं से शिक्षा लेना आवश्यक हैं
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५३

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