इतिहास के पन्नों में दबे स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारी बाहर लाना देश की बड़ी सेवा- डाॅ. आलोक त्रिपाठी

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  • दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘स्वतंत्रता-संग्राम में जैन विषय पर हुई चर्चा
  • कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की अध्यक्षता में हुआ उद्घाटन

सरदार वल्लभ भाई पटेल पुलिस सुरक्षा एवं आपराधिक न्याय विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपति डाॅ. आलोक त्रिपाठी ने कहा है कि आजादी की लड़ाई केवल स्वतंता प्राप्त होने तक ही समाप्त नहीं हो गई थी, बल्कि आज स्वतंत्रता के सामने नई चुनौतियां मौजूद हैं, जिनका मुकाबले के लिए नए संघर्ष व नए तरीके होंगे। वे यहां भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के प्रायोजन में यहां जैन विश्वभारती संस्थान मान्य विश्वविद्यालय के जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने ‘भारत की स्वतंत्रता-संग्राम में जैन स्वतंत्र्य-सैनानियों का भूले-बिसरे इतिहास’ विषय पर आयोजित इस राष्ट्रीय सेमिनार में आजादी के सेनानियों को लेखबद्ध करने की जरूरत बताते हुए कहा कि इतिहास के पन्नों में दबे स्वतंत्रता सेनानियों की जानकारी को बाहर लाना देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। इतिहास में तथ्य होते हैं और ये तथ्य आईना होते हैं। महात्मा गांधी के पीछे जैन समाज के तथ्य ही थे और उन्हीं को लेकर वे आगे बढे थे।

आवश्यक है इतिहास का पुनर्लेखन

यहां आचार्य महाप्रज्ञ-महाश्रमण आॅडिटोरियम आयोजित इस सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए जैविभा के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि जैन समाज ने स्वतंत्रता के लिए अहुत बलिदान दिए हैं। इनका इतिहास भले ही लिखा गया या नहीं लिखा गया हो, लेकिन इन्न बलिदानों को भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि इतिहास अपने स्वार्थों से लिखा जाता है। इसीलिए आज इतिहास के पुनर्लेखन पर कार्य चल रहा है। यह आवश्यक भी है, क्योंकि जिस नजरिए से देश का इतिहास लिखा गया, वह अंग्रेजों का था। उन्होंने आजादी के पूर्व और आजादी के बाद तब तक जैन समाज के देश को दिएगए योगदान का जिक्र किया और बताया कि आज देश में मात्र 0.37 प्रतिशत जैन आबादी है, लेकिन देश के कुल दान का 60 प्रतिशत हिस्सा जैन समाज का है। देश के कुल टेक्स का 24 प्रतिशत हिस्सा जैन समाज के लोग देश को देते हैं। देश में सबसे ज्यादा गौशालाओं का संचालन जैन समाज के लोग कर रहे हैं।

जैन समाज के पांच हजार लोगों ने की जेल-यात्राएं

राष्ट्रीय सेमिनार की विशिष्ट अतिथि डाॅ. ज्योति जैन (खतौली) ने प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि जब आजादी का अमृम महोत्सव मनाया जा रहा है तो ऐसे में हमें भुला दिए गए आजादी के संघर्ष करने वाले शूरवीरों को भी याद करना चाहिए। 1857 से लेकर 1947 तक आजादी के लिए बहुत बलिदान दिए गए। उनकी शोध की गई है, जिसमें पता चला कि आजादी के लिए जैन समाज का बहुत योगदान रहा था। व्यक्ति किसी भी पाि पर रह कर देश की सेवा कर सकता है। जैन समाज के लोगों ने स्वयं संघर्ष में सीधा भाग लिया, वहीं बहुत सारे जेलों में बंद लोगों के परिवार के भरण-पोषण का बीड़ा भी उठाया। उन्होंने इस विषय पर स्वयं द्वारा लिखित पुस्तक के प्रािम व द्वितीय भाग को तैयार करने के बारे में आई मुसीबतों का विवरण भी प्रस्तुत किया।

डा. जैन ने बताया कि आजादी के लिए जैन समाज के 5 हजार लोगों ने जेल-यात्राएं की और करीब 22 ने अपना बलिदान तक दिया था। महिलाएं भी स्वतंत्रता आंदोलन में पीछे नहीं रहीं, उन्होंने भी जेल-यात्राएं की थी। वे जुलूसों में शामिल होकर नारे लगाती थी और राष्ट्र की जागृति का काम करती थी। देश के संविधान के निर्माण में भी अनेक जैन समाज के लोगों का योगदान रहा था। राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र के प्रारम्भ में जैन विद्या विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। कुलसचिव प्रो. बीएल जैन ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। सेमिनार का प्रारम्भ समणी प्रणव प्रज्ञा के मंगल संगान से किया गया। अंत में संगोष्ठी समन्वयक समणी अमलप्रज्ञा ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने किया।

जैन दर्शन के अनुसार देश का प्रत्येक नागरिक जैन है- प्रो. दुबे

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य अतिथि रामानन्द विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे ने कहा है कि जैन दर्शन के सिद्धांतों के अनुसार इस देश का प्रत्येक नागरिक जैन ही है। सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, अपरिग्रह का कोई विरोध नहीं कर सकता है। हर व्यक्ति को दैहिक, दैविक व भौतिक दुःखों से मुक्ति के लिए जैन दर्शन मागदर्शक सिद्ध होता है। विषयों के समग्र प्रतिपादन के लिए अनेकांत उपयोगी है। उन्होेंने कहा कि देश को पराधीनता से मुक्ति दिलवाने के लिए जैन समाज के लोगों ने भी प्राणों की बाजी लगाई थी।

उनका इतिहास लिखा जाना चाहिए। समारोह की अध्यक्षता करते हुए जैविभा विश्वविद्यालय के विशिष्ट अधिकारी प्रो. नलिन के. शास्त्री ने कहा कि जैन को जातिवाद में बांधने के बजाए कर्मणा जैन की संतों की कल्पना को साकार करना चाहिए। उन्होंने कलिंग नरेश खारवेल से लेकर चन्द्रगुप्त, चामुंडराय आदि से होते हुए राज्य व्यवस्थाओं व सैन्य कार्यों सेजुड़े लोगों के बारे में बताया और नेताजी सुभाष बोस के सहयोगी रहे राजकुमार काशलीवाल और अन्य स्वतंत्रता आंदोलन से सम्बद्ध रहे जैन समाज के लोगों का विवरण देते हुए योगदान को उल्लेखित किया। विशिष्ट अतिथि साहित्य संस्कृति विद्यापीठ के पूर्व निदेशक प्रो. देव कोठारी ने भी अपने चिार रखते हुए संगोष्ठी के विषय की उपादेयता बताई और जैन समाज की सहभागिता को प्रतिपादित किया। कार्यक्रम में सुषमा स्वरूप व प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के अपने दो दिनों के अनुभवों को साझा किया और संगोष्ठी की उपयोगिता बताई। प्रारम्भ में कार्यक्रम समन्वयक डा. समणी अमलप्रज्ञा ने दो दिवसीय संगोष्ठी का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने किया।

विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने किए पत्रवाचन

इस सेमिनार के प्रथम सत्र का आयोजन प्रो. देव कोठारी की अध्यक्षता में किया गया। सारस्वत अतिथि प्रो. श्रयांस कुमार सिंघई रहे। इस सत्र में विद्वान शोधवेताओं प्रो. जयकुमार जैन, डाॅ. सुमिति जैन, डाॅ. श्वेता जैन व सुबोध जैन ने विषय से सम्बंधित पत्रवाचन किया। संयोजन डा. सत्यनारायण भारद्वाज ने किया। द्वितीय सत्र का आयोजन प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन की अध्यक्षतामें हुआ, जिसमे ंसरस्वत अतिथि डा. रविन्द सहाय रहे। प्रो. श्रयांस कुमार जैन, डाॅ. सुरेन्द्र सोनी, डाॅ. ज्योति बाबू, डाॅ. योगेश जैन, डाॅ. समणी संगीत प्रज्ञा, स्वस्तिका जैन, मेघा जैन, डाॅ मनीषा जैन ने अपने पत्रवाचन किए। संयोजन अच्युतकांत ने किया। तृतीय सत्र में अध्यक्ष के रूप में प्रो. सुषमा सिंघवी और सारस्वत अतिथि प्रो. अशोक कुुमार जैन रहे। इस सत्र में प्रो. कमलेश कुमार जैन, डाॅ. सुनिता इंदौरिया, व डाॅ. कमल नौलखा ने पत्रवाचन किए। संयोजन सव्यसांची सारंगी ने किया। इस सेमिनार के दौरान आदि 60 सम्भगियों ने अपने पत्रवाचन प्रस्तुत किए।

प्रेषक: डाॅ. मनीषा जैन, लाडनूं

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