10 साल बाद झाँसी में पधारे भावलिंगी संत, संतों का हुआ अभूतपूर्व वात्सल्य मिलन । महामंत्र णमोकार से णमोकार का मिलन है संतो का वात्सल्य मिलन !

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बुन्देली धरा महानगर झाँसी में बही वात्सल्य की अनुपम अभूतपूर्व पावन गंगा । जीवन है पानी की बूंद महाकाव्य के मूल रचियता भावलिंगी संत आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज (ससंघ) के की आगवानी करने पहुँचे पूज्य आचार्य श्री विद्या सागर जी मुनिमहाराज के सुयोग्य शिष्य मुनि श्री अविचल सागर जी मुनिराज । जन्मभूमि जतारा टीकमगढ़ से पद विहार करते हुए आ रहे भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी मुनिराज ०१ दिसम्बर की प्राप्त बेला में बुन्देली धर्मनगरी झाँसी में मंगल पदार्पण हुमा अतिशय दक्षेत्र करमुती जी में पूर्व से विराजमान मुनिश्री अविचल सागर जी ने नगर के प्रमुख न्चौराहे पर पहुंचकर आचार्य संघ की भव्यातिभव्य अगवानी की तथा भक्ति-विभोर होकर आचार्य श्री की त्रय परिक्रमा लगाकर आचार्य श्री के इय पालन चरणों का पवित्र जल से पाद-प्रक्षालन किया। आचार्यश्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने भी विनय भाव परिपूर्ण मुनि श्री अविन्चल सागर जी को हृदय से लगाकर अपना प्रेम-स्नेह व वात्सल्य मुनिश्री पर उड़ेल दिया। दोनों संघों का परस्पर अभूतपूर्व वात्स्य मिलन देखकर दर्शक बने श्रद्धालुओं के नेत्र व हथम मचत हो उठे। साथ ही मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने भी आचार्य संघ का भव्य स्वागत किया। 23 पीद्दीधारी साधकों का विशाल समुदाय विशाल जनमेदिनी के साथै अतिशय क्षेत्र करगुवाँ जी पहुँचे । क्षेत्र पर विराजमान 23 वे तीर्थकर सांवलिया पार्श्वनाथ भगवान के दर्शनकर आचार्य श्री सहित सभी के हृदयकमल खिल उठे। भावपूर्ण बन्दना कर सभी साधकगठा धर्मसभा में विराजित हुए। प्राथमिक औपचारिकतामों के पश्चात पूज्य आवार्य श्री शुद्धोपयोगी अंत सूरिगच्छाचार्य श्री विराग सागर जी महामुनिराज का 41 वाँ मुनि दीक्षा भी मनाया गया । 41 वें संयम महोत्व पर श्रद्धालु भक्तों ने गणाचार्य श्री की भक्ति पूर्वक मष्ट द्रव्य से पूजा की। अतिशय क्षेत्र मुखरित हुई आचार्य श्री की अतिशयकारी वाणी अतिशय कारी सांवलिया पार्श्वनाथ के दर्शन कर आचार्य ने धर्मस्था के बीच झपने उपदेश में कहा- यह पावन क्षेत्र एक मात्र सांवलिया पार्श्वनाथ स्वामी का है। प्रभु के अतिशय से यहाँ का कण-कण पवित्र हो रहा है। आज मुनिवर श्री अविचल सागर जी से मिलन कर तो ऐसा लगा रहा है जैसे में अपने भव-भव से बनते आ रहे भाई से ही मिल रहा हूँ। जब हम आपस में मिलते हैं तो आपको लगता होगा कि एक संत दूसरे गंत से मिलन कर रहा है लेकिन ध्यान रखना, यह मिलन संत से संत का मिलन नहीं है यह तो महामंत्र णमोकार से महामंत्र ठामोकार का मिलन है। यह संतों का वात्सल्य मिलन समूची समष्टि को प्रेग-मैत्री-एकता के साथ हिल-मिलकर रहने की पावन प्रेरणा है। *आज पावन सुखद संयोग बना कि अतिशय क्षेत्र पर ही पूज्य आचार्य गुरुदेव श्री विरागमागर जी महामुनिराज का 41 वाँ संयम महोत्सव भी हम मना रहे हैं। वाजव में आचार्य गुरुवर साधना के उच्चतम शिखर को प्राप्त हो रहे हैं। अपने साथ-साथ गुरुदेव सैकडों भव्य-आत्माओं को सद राह दिखाते हुए उनका धर्म मार्ग प्रशस्त कर भारतीय वसुंधरा को चेतन रत्नों से पूरित करते जा रहे हैं। यह घरा गुरुदेव । असीम उपकारों का ऋण कभी नहीं चुका सकती।

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