महावीर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज भोपाल की अवनति का कारण —पैसा ,पद ,प्रतिष्ठा ,प्रतिस्पर्धा

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नीव के पत्थर कभी मीनार नहीं देखते हैं .हम गुरुवर संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी को बहुत मानते हैं पर उनकी नहीं मानते हैं .जिस उद्देश्य से यह परिकल्पना धरातल पर आयी थी उसको सफलीभूत कराने का दायित्व ट्रस्टी को होता हैं यदि ट्रस्टी ही भ्र्ष्टि हो जाए तो क्या कहा जाय .यदि खेत की बागड़ खेत को खाने लगे तो फसल को कौन बचाएगा .माली ही बगीचे को लुटे तो बगीचे का क्या दोष ?संस्था का मुख्य उद्देश्य जन सेवा के साथ मानव कल्याण करना हैं पर वह धेय गौण होकर स्वा -हिती बन गए या हो गए इसमें संस्था और आचार्यश्री का क्या दोष हैं .जितनी नैतिकता, शुचिता और समर्पण मुखियों का होना चाहिए था वह हैं या नहीं या होगा .असंभव हैं .
असाध्यायेँन प्रति नासास्ति चिंता .चिकित्सा शास्त्र में यह बताया गया हैं की यदि रोग और रोगी असाध्य हो जाय तो चिकित्सक को चिंता नहीं करनी चाहिए .वैसे जितने भी मुखिया बने बैठे हैं उनका निजी धन इसमें बिलकुल नहीं लगा हैं .मुफ्त का चन्दन मिल बांटकर खाओ .पंचायती राज में सबको समानाधिकार होता हैं और वह अपने आप में स्वयंभू नेता हैं .कोई किसी की अधीनता नहीं स्वीकारता हैं .जैन दर्शन में मूल सिद्धांत अहिंसा ,अपरिग्रह और अनेकांतवाद की ना मानना और इसके के साथ हिंसा ,झूठ, चोरी, ,कुशील, परिग्रह के अलावा क्रोध,मान,माया ,लोभ से रंगे हैं और दशलक्षण धर्म मनाते हैं .
समस्या बहुत बड़ी भी हैं और बहुत छोटी हैं .नजरिया सुधारने की जरुरत हैं .
क्रांति हमेशा गरीबो एवं मूर्खों से आती हैं .दो होशियार कभी एक साथ नहीं रह सकते और न बैठ सकते .वह राजा जो प्रसन्न होने पर पुरुस्कार न दे सके और कुपित होने पर दंड न दे सके वह नपुंसक होता हैं .पूरा तालाब भांग से भरा हुआ हैं .समाज की संस्था का उपयोग मात्र पद,पैसा ,प्रतिष्ठा ,
प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा के लिए हैं ,निःस्वार्थ कार्य किया जाता हो आज संस्था अग्रणी होती पर पर —वहां पर भी सरकारी तंत्र जैसा भ्रष्टाचार .कई अनुभवी सरकारी अधिकारी जो सेवानिवृत्त हैं उनको उस संस्था के माधयम से वैसी ही सुविधा ले रहे हैं .उनको संस्था की चिंता नहीं हैं ,कारण संस्था उसने लिए दूध देने वाली गाय हैं खूब दूहो .
इतना अधिक क़र्ज़ और उसका ब्याज इतना अधिक हैं की आमदनी न दिखाई दे रही हैं और खर्च निरंतर होता हैं .यह सफ़ेद हाथी जैसा पालना हैं .कोई को कोई चिंता नहीं .मालूम हैं न कोई धन अपने साथ ले जायेगा और यश कौन का कितने दिन रहा हैं .धर्म के मार्ग को भूलकर निरंतर पापों और कषायों में संलिप्त हैं और अगले भव में और पाप की गठरी साथ ले जा रहे हैं .
सुना हैं कुछ लोग जो उसके कर्णधार हैं वे उसे हथियाना चाह रहे हैं .अच्छी बात घी कहाँ गया खिचड़ी में पर जिनका भरोसा लिया और जिन्होंने जिस भरोसे पर दान चंदा दिया उनके भावों की क्या परिणति होंगी .
जिस उद्देश्य और भाव से संस्था की नीव डाली गयी थी उसको सफलीभूत करना यह प्रथम कर्तव्य हैं .रहा सवाल प्रतिष्ठा ,पद ,पैसा महत्वपूर्ण हैं पर कब तक और किसके लिए .
कपट न कीजे कोय ,चोरन के पुर ना बसे .
सरल सुभावी होय ,ताके घर बहु सम्पदा .
उत्तम सत्य -वरत पालीज़े ,पर -विश्वास घात नहीं कीजे .
सांचे झूठे मानुष देखो आपन पूत स्वपास न पेखो .
यदि जैन दर्शन की और आचार्य श्री की ना मानना हो तो अपने नाम से जैन शब्द हटाओ और एक बात ध्यान रखना आपके सब कर्मों की रिकॉर्डिंग हो रही हैं वहां कोई अपील दलील और वकील नहीं लगेगा .
संसार रूपी गहन में हैं जीव बहु दुःख भोगता ,
वह बाहरी सब वस्तुओं के साथ कर संयोगता .
यदि मुक्ति की चाह तो फिर जीवगण ! सुन लीजिये ,
मन से वचन से -काय से उसको अलग कर दीजिये .
अंत में महाभारत और रामायण की घटना मात्र एक स्त्री के कारण हुई थी इसलिए हमारे यहाँ भी कहा गया हैं संसार में विष–बेल नारी .स्त्री चरित्र की थाह लेना असंभव हैं ,उनका हस्तक्षेप विनाश और अवनति का कारण होगा .
भगवान् महावीर स्वामी सबको सद्बुद्धि दे और आचार्यश्री की मनोकामना पूरी हो और संस्था पुनः सफलीभूत हो यही कामना करता हूँ .
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल ०९४२५००६७५३

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