परम तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर महाराज का 88 ” अवतरण दिवस पर शत-शत नमन

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आचार्य परम तपस्वी शिरोमणि 108 सन्मति सागर जी महाराज महान तपस्वी की अद्भुत मुहूर्त थी
आदि सागर अंकलीकर परंपरा के
पटाधीश से जिन्होंने अपना आचार्य पद आचार्य सुनील सागर महाराज को दिया
आचार्य सुनील सागर महाराज ने पूरे भारतवर्ष में अंकलीकर परंपरा का निर्वाह कर जैन धर्म की एक पताका लहराई
जहां-जहां भी आचार्य सुनील सागर महाराज जाते हैं वहां पर कांटो के मार्ग फूलों के मार्ग बन जाते हैं जो
जो अपने मुंह से करते हैं वह शास्त्र बन जाते हैं किशनगढ़ में उनका वर्षा योग हुआ था वह देखने का हमें तीन-चार बार जाने का उनके सानिध्य में सौभाग्य मिला था
इतने बड़े आचार्य होने पर भी उनके भक्तों के प्रति बहुत स्नेह है बहुत लगाव हमने आंखों से वहां पर देखा है इतने लंबे मुनि संघ माताजी का का संचालन करना बहुत बड़े आशय की बात में मानता हूं
धन्य आज आचार्य सुनील सागर महाराज जिनकी दिव्या देशना सुनने को भक्त तरसते हैं
आचार्य समाधि सम्राट सन्मति सागर महाराज एक ऐसे दिगंबर संत थे जिन्होंने अपने जीवन से कभी शरीर से मोह रखा ही नहीं था
उन्होंने कहा था कि शरीर तो एक नश्वर है आत्मा अमर है शरीर तो जलकर मिट्टी में मिल जाएगा लेकिन आत्मा परमात्मा बन जाती है त्याग करने पर अग्नि की तपन प्राप्त करने पर सोना खरा सोना बनता है

उपवासों के मामले में वह पहले संत थे जिन्होंने अपने जीवन में उपवास करने में एक रिकॉर्ड बनाया है दो उपवास एक आहार तीन उपवास आहार और आठ उपवास एक बार 15 उपवास एक बार महीने महीने तक इन्होंने उपवास किए हैं
उन्होंने गेहूं का आटा त्याग कर केले की रोटी आहार में लेते थे अंतिम समय में आचार्य श्री ने केवल मात्र आहार में दही का मठा पानी प्रारंभ कर दिया था
जब उनका वर्षा योग मुंबई में था तो हमें भी वहां पर जाने का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और जिस दिन आहार था उसी दिन हमारा जाना हुआ हमने भी आचार्य श्री को अपने हाथों से आहार देने का सौभाग्य प्राप्त किया
नैनवा जिला बूंदी में जब आचार्य श्री आए थे तभी से उनका आशीष कृपा सानिध्य मिला था तब से अंतिम समय तक उनका आशीष हमारे ऊपर बना रहा
आज मैं जिला बूंदी नैनवां में महावीर कुमार सरावगी जैन गजट पत्रकार संवाददाता के रूप में अपनी कलम से साधु संतों के ज्यादा से ज्यादा प्रवचन दिव्या देशना प्रकाशित करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त है
यह सब आचार्य तपस्वी सम्राट सन्मति सागर महाराज की एक विशेष कृपा का जीता-जागता उदाहरण है
इस पंचम काल में दिगंबर संतो का आशीष भक्तों पर कृपा बना रहना बहुत बड़ा पुण्य कारण है
इस 88 से अवतरण दिवस पर उनको बारंबार त्रिकाल नमोस्तु समर्पित करता हूं
आपका अनन्य भक्त परम शिष्य
– महावीर कुमार जैन सरावगी जैन गजट संवाददाता नैनवा जिला बूंदी राजस्थान

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