तीर्थराज सम्मेद शिखर की पावन पवित्रता को खतरा

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प्राचीन तीर्थ स्थल भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर होती है इसकी रक्षा सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।

कल युग की ये कैसी बलिहारी है पाप ओर अत्याचार तीर्थ स्थलों पर पड रहे भारी है।

✍️ पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा (राज.) की कलम से

गिरीडीह (झारखंड)
प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण धरती का स्वर्ग “एक बार बंदे जो कोई ताहि नरक पशुपति नहीं होहि” ऐसे महान तीर्थराज सम्मेद शिखर जी की बात है जहां से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया है। तीर्थ स्थलों का कण-कण पूजनीय वंदनीय अभिनंदनीय होता है तीर्थ स्थलों की पावन भूमि अनंत अनंत जीवो के भव्य आत्माओं के तप त्याग और साधना की रज से पवित्र होती है जिस जगह से करोड़ों जीवात्मा भव्य आत्माओं ने संसार शरीर और भोगों से मुक्त होकर संयम तप त्याग और साधना के मार्ग को अपनाकर स्वयं को संसार के बंधनों से मुक्त कर लिया परमात्म पद को प्राप्त कर लिया । ऐसे पवित्र पावन स्थान को अपवित्र करना कचरा व गंदगी फैलाना कितने घोर पापों का बंध का कार्य हो रहा है। हर साल 14 व 15 फरवरी को लाखों की संख्या में आदिवासी लोग पर्यटन के हिसाब से तीर्थराज पर्वत पर चढ़ाई करते हैं घूमने फिरने आते है उन दिनों बाहर से आने वाले जैन तीर्थ यात्रियों को ऊपर वंदना के लिए नहीं जाने दिया जाता है।ये लोग पूरे पर्वत पर अपवित्रता फैलाते है गंदगी करते है गलत चीज़ों का सेवन भी करते है। पूरे भारत का जैन समाज मूक दर्शक बनकर देखता रहता है । ये कैसी विडंबना है। तीर्थ स्थलों की वंदना करने से जन्मों-जन्मों के पापों का अंत होता है और सातिशय पुण्य का संचय होता है ये स्थल पतित से पावन नर से नारायण तितर से तीर्थंकर बनने के लिए होते है। आज के कलयुग में हमें कैसे कैसे नजारे देखने को मिल रहे है।यह सब ऐसा कई सालों से चल रहा। हमें ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए जो प्रकृति में विकृति लाने के कारण बनते है। जब जब मानव ने प्रकृति के आयामो के साथ खिलवाड़ किया है तब तब प्रकृति ने अपना विकृति का तांडव रूप मानव को दिखाया है। हमें प्रकृति में संस्कृति का शंखनाद करना चाहिए।प्रकृति में विकृति का सबसे बड़ा रूप कोरोना संपूर्ण मानव जाति को सबक सीखा कर चला गया सादगी से रहना सीखा गया।पूजनीय अभिनंदनीय वंदनीय तीर्थ स्थलों को अपवित्र किया जा रहा है ये संपूर्ण भारत वर्ष की जैन समाज के लिए बहुत सोचनीय विचारणीय गंभीर विषय है। इसको बेहद शर्मनाक कलंकित घटना कहा जा सकता है। “कल युग की ये कैसी बलिहारी है पाप और अत्याचार तीर्थ स्थलों पड रहे भारी है” । हमको “तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ तीर्थों पर बाउंड्री वाल करवाओ” बस ये ही करना परम आवश्यक है। मुझे एक बात समझ नहीं आती आज तक संपूर्ण भारतवर्ष में किसी भी जैन समुदाय द्वारा किसी अन्य धर्म संप्रदाय की जगह पर अवैध कब्जा नहीं किया तो फिर लोग क्यों हमारे अतिशय क्षेत्र सिद्ध क्षेत्रों तीर्थ क्षेत्रों पर नाजायज कब्जा करने में लगे हुवे है। तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल नहीं जैन तीर्थ घोषित किया जाना चाहिए। तीर्थ स्थलों की प्राचीनता ऐतिहासिकता, भव्यता, पुरातत्वता, पावनता, पवित्रता, प्रमाणिकता ज्यो की त्यों बनी रहनी चाहिए। प्राचीन तीर्थ स्थल भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर होती है इसकी रक्षा सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। शासन प्रशासन की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। मैं राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार कोटा (राज.) बड़ी बड़ी जैन संस्थाओं के प्रतिनिधि मंडल से तीर्थ क्षेत्र कमेटियों से हृदय की असीम गहराइयों से आत्मीय निवेदन करता हूं कि वे इस विषय को बड़ी गम्भीरता से लेवे। ये वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है। ये सोचनीय विचारणीय गंभीर विषय है। तीर्थ स्थलों की पावनता पवित्रता भव्यता पुरातत्वता प्रमाणिकता बनी रहे ऐसा सद प्रयास करे।
प्रस्तुति
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार
कोटा (राज.)
9414764980

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